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पोस्टर बने गुटबाजी का ‘अखाड़ा’

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  • अपने ही नेताओं के पोस्टर फाड़ रहे कांग्रेस नेता
  • चुनाव से पहले घर की लड़ाई आ गई सड़कों पर
  • भीतर सब कुछ ठीक होने के दावों पर उठे सवाल

देहरादून। चुनावी तैयारियों के बीच कांग्रेस जिस एकजुटता का दावा कर रही है, जमीन पर तस्वीर उससे अलग दिखाई देने लगी है। पार्टी के भीतर खींचतान और गुटबाजी अब बंद कमरों से निकलकर सड़कों तक पहुंचती नजर आ रही है। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि कुछ कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने अपने ही पार्टी नेताओं के पोस्टर फाड़ दिए।
पोस्टर फाड़े जाने की घटना को महज राजनीतिक नाराजगी मानकर नजरअंदाज करना कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा। क्योंकि चुनावी मौसम में पोस्टर केवल प्रचार सामग्री नहीं होते, बल्कि पार्टी के भीतर शक्ति-संतुलन और स्वीकार्यता का भी संकेत देते हैं। जब कार्यकर्ता विपक्षी दल के पोस्टर हटाने के बजाय अपने ही नेताओं के पोस्टर फाड़ने लगें तो सवाल संगठन की एकजुटता पर ही उठता है।
कांग्रेस लंबे समय से गुटबाजी के आरोपों से जूझती रही है। प्रदेश स्तर पर अलग-अलग नेताओं के अपने-अपने समर्थक हैं और राजनीतिक कार्यक्रमों में भी कई बार शक्ति प्रदर्शन की तस्वीर सामने आती रही है। अब पोस्टर विवाद ने इस अंदरूनी खींचतान को और खुलकर सामने ला दिया है। पार्टी नेतृत्व भले ही इसे स्थानीय विवाद बताकर किनारा करे, लेकिन चुनाव से पहले ऐसी घटनाएं कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकती हैं। कार्यकर्ताओं का संदेश यदि यह जाता है कि पार्टी अपने ही नेताओं को लेकर एकमत नहीं है, तो उसका सीधा असर चुनावी अभियान पर पड़ सकता है।
भाजपा के लिए कांग्रेस की अंदरूनी कलह किसी राजनीतिक अवसर से कम नहीं है। भाजपा लंबे समय से कांग्रेस पर नेतृत्व संकट और गुटबाजी का आरोप लगाती रही है। अब अपने नेताओं के पोस्टर फाड़े जाने की घटना विपक्ष को कांग्रेस पर हमला करने के लिए नया मुद्दा दे सकती है। कांग्रेस के सामने असली चुनौती केवल पोस्टर विवाद को रोकने की नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के भीतर पैदा हो रही नाराजगी को संभालने की है। चुनाव केवल बड़े नेताओं की सभाओं से नहीं जीते जाते। बूथ पर वही कार्यकर्ता पार्टी का झंडा लेकर खड़ा होता है, जिसे नेतृत्व पर भरोसा हो।
राजनीतिक हलकों में इस तरह के विवादों को आगामी विधानसभा चुनाव की टिकट राजनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है। चुनाव नजदीक आते ही दावेदारों की संख्या बढ़ती है और नेताओं के बीच प्रभाव क्षेत्र को लेकर प्रतिस्पर्धा तेज होती है। ऐसे में पोस्टर, बैनर और कार्यक्रमों में चेहरे को लेकर विवाद कई बार अंदरूनी शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन जाते हैं। यदि यही स्थिति आगे बढ़ी तो कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौती होगीकृएक तरफ भाजपा का चुनावी संगठन और दूसरी तरफ अपने ही खेमों को एक मंच पर लाने की चुनौती।
पोस्टर फाड़ने की राजनीति देखने में छोटी घटना लग सकती है, लेकिन इसके पीछे छिपा संदेश बड़ा है। चुनाव से पहले किसी भी राजनीतिक दल के लिए सबसे जरूरी उसकी एकजुटता की छवि होती है। जनता के सामने यदि पार्टी अपने ही नेताओं को लेकर बंटी दिखाई दे तो विपक्ष को हमला करने का मौका मिलता है और कार्यकर्ताओं का उत्साह भी प्रभावित होता है। कांग्रेस को अब तय करना होगा कि वह इस विवाद को स्थानीय कार्यकर्ताओं की नाराजगी मानकर छोड़ती है या इसके पीछे मौजूद असंतोष की तह तक जाती है। क्योंकि विपक्ष के पोस्टर फाड़ना राजनीतिक संघर्ष है, लेकिन अपने ही नेताओं के पोस्टर फाड़ना संगठन के भीतर चल रहे संघर्ष का संकेत।
चुनाव की लड़ाई अभी शुरू भी नहीं हुई और कांग्रेस के भीतर पोस्टर ही आपसी मुकाबले का मैदान बनने लगे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही हैकृकांग्रेस भाजपा से लड़ेगी या पहले अपने घर की लड़ाई खत्म करेगी?

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