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दूनघाटी में पीजी का ‘काला’ कारोबार

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  • बिना लाइसेंस वमानकों की अनदेखी के आरोपों ने खड़े किए हैं सवाल
  • छात्र-छात्राओं से मोटी रकम वसूलने वाले संचालकों पर निगरानी कितनी
  • पुलिस की चेकिंग में सत्यापन और सीसीटीवी, पीजी नेटवर्क की चुनौती
  • सवाल यह कि राजधानी में कितने पीजी वास्तव में मानकों पर खरे उतरते

देहरादून। राजधानी देहरादून में पढ़ाई और रोजगार के लिए आने वाले युवाओं के लिए पीजी आवास बड़ी जरूरत बन चुके हैं, लेकिन इसी जरूरत ने एक बड़े कारोबार का रूप ले लिया है। शहर के कई इलाकों में मकानों और व्यावसायिक भवनों को पीजी में तब्दील कर दिया गया है। सवाल अब सिर्फ किराये और सुविधाओं का नहीं, बल्कि इन पीजी की वैधता, अग्निसुरक्षा, भवन क्षमता, पुलिस सत्यापन और संचालकों की जवाबदेही का है। पीजी कारोबार में बड़ी रकम घूम रही है, लेकिन इसके समानांतर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या हर संचालक जरूरी अनुमति और सुरक्षा मानकों का पालन कर रहा है? हालिया रिपोर्टों में देहरादून के कई पीजी में अग्निसुरक्षा से जुड़े नियमों की अनदेखी की शिकायतें सामने आई हैं। इनमें पर्याप्त निकासी व्यवस्था, अग्निशमन उपकरण और अन्य सुरक्षा उपायों को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
राजधानी के शिक्षण संस्थानों और रोजगार केंद्रों के आसपास पीजी की मांग लगातार बनी हुई है। इसका सीधा फायदा संचालकों को मिलता है। एक ही भवन में कई कमरों को किराये पर देकर संचालक नियमित आय अर्जित करते हैं। लेकिन जिस भवन में दर्जनों युवक-युवतियां रह रहे हों, वहां फायर सेफ्टी, विद्युत सुरक्षा, आपातकालीन निकास, भवन की क्षमता और पुलिस सत्यापन जैसे मानक महज कागजी औपचारिकता नहीं हो सकते। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस पीजी में एक साथ बड़ी संख्या में लोग रह रहे हैं, उसकी सुरक्षा जांच आखिरी बार कब हुई?
पीजी में सुरक्षा की अनदेखी का खतरा केवल चोरी या अपराध तक सीमित नहीं है। आग, गैस रिसाव, शार्ट सर्किट अथवा भवन संबंधी दुर्घटना की स्थिति में भीड़भाड़ वाले भवन गंभीर खतरा बन सकते हैं। हाल ही में सेलाकुई के एक निजी छात्रावास में आग की घटना के बाद अग्निशमन विभाग की जांच में अनिवार्य अग्निशमन अनापत्ति प्रमाणपत्र नहीं होने तथा स्मोक डिटेक्टर और स्प्रिंकलर जैसी व्यवस्थाओं के अभाव की बात सामने आई थी। यह घटना राजधानी और आसपास के क्षेत्रों में संचालित छात्रावासों तथा पीजी की सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक जांच की जरूरत को सामने लाती है।
सरकार और प्रशासन का रुख यह रहा है कि नियमों का उल्लंघन करने वाले आवासीय और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई की जाएगी। देहरादून पुलिस ने अगस्त में प्रेमनगर क्षेत्र के पीजी और हास्टलों में चेकिंग अभियान चलाया। संचालकों को रहने वालों का शत-प्रतिशत पुलिस सत्यापन कराने और सीसीटीवी लगाने के निर्देश दिए गए। बाहरी लोगों के प्रवेश तथा अन्य गतिविधियों पर भी निगरानी बढ़ाने को कहा गया। प्रशासन इससे पहले दूसरे तरह के आवासीय व्यवसायों में भी कार्रवाई कर चुका है। मई 2026 में मानकों के विपरीत संचालित 96 होमस्टे के पंजीकरण निरस्त किए गए थे। निरीक्षण में कई जगह अग्निशमन उपकरणों की कमी जैसी खामियां भी मिली थीं। यानी सरकार का संदेश साफ हैकृमानकों से खिलवाड़ स्वीकार नहीं होगा।
सवाल यह है कि यदि होमस्टे के मामले में निरीक्षण और पंजीकरण निरस्तीकरण की कार्रवाई हो सकती है तो राजधानी के पीजी नेटवर्क की भी संयुक्त सुरक्षा जांच क्यों न हो? प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि देहरादून में कितने पीजी संचालित हैं, इनमें से कितने पंजीकृत हैं, कितनों के पास जरूरी अग्निसुरक्षा स्वीकृति है और कितने भवन अपनी स्वीकृत क्षमता के अनुरूप छात्रों को आवास दे रहे हैं। सिर्फ पुलिस सत्यापन और सीसीटीवी से पूरी समस्या का समाधान नहीं होगा। भवन सुरक्षा, अग्निसुरक्षा, स्वच्छता, विद्युत व्यवस्था, आपातकालीन निकास और किरायेदारों के रिकार्डकृसभी की एक साथ जांच जरूरी है।
राजधानी में पीजी अब महज मकान किराये पर देने का मामला नहीं रह गया है। यह हजारों विद्यार्थियों और कामकाजी युवाओं की सुरक्षा से जुड़ा विषय है। इसलिए प्रशासन को पीजी संचालकों की सूची सार्वजनिक करने, नियमित निरीक्षण कराने और मानकों का उल्लंघन मिलने पर नोटिस से लेकर सीलिंग तक की कार्रवाई का स्पष्ट तंत्र बनाना चाहिए। क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं कि पीजी से कितना पैसा कमाया जा रहा है। असली सवाल यह है कि उस पैसे के बदले वहां रहने वालों को कितनी सुरक्षा दी जा रही है। सरकार के सामने चुनौती यही है। राजधानी में पीजी कारोबार चले, लेकिन नियमों की कीमत पर नहीं।
बता दें कि उत्तराखंड हाईकोर्ट ने जुलाई 2026 में देहरादून से जुड़े एक मामले में अग्निसुरक्षा कमियों के बावजूद फायर एनओसी जारी करने संबंधी जिलाधिकारी के आदेश को निरस्त किया था, जिससे अग्निसुरक्षा प्रमाणन में नियमों के पालन की गंभीरता सामने आती है।

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