उत्तराखंड के पंचायत चुनाव के नतीजे आने के बाद अब जिला पंचायत अध्यक्ष पदों के लिए रास्सा कशी शुरू हो चुकी है। एक तरफ पंचायत चुनाव में आशातीत जीत न मिलने के बाद भी भाजपा सभी जिलों में अपने अध्यक्षों की जीत का दावा कर रही है वहीं कांग्रेस अपने दलगत सियासी दांव पेंचो में उलझी हुई है। भाजपा जिसे जोड़—तोड़ की राजनीति में महारत हासिल है और इसके लिए उसके पास पर्याप्त संसाधन उपलब्ध है वह कांग्रेस को पटकनी दे सकती है। बात अगर देहरादून की ही की जाए जहां 30 पंचायत सदस्यों में भाजपा को सिर्फ 7 सीट ही मिल सकी है और कांग्रेस के पास 13 सदस्य हैं जो जीतकर आए हैं फिर भी यहंा भाजपा प्रत्याशी मधु चौहान जो दो बार जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुकी हैं, को इस रेस में सबसे आगे लाकर खड़ा कर दिया है। प्रीतम सिंह जो अपने बेटे अभिषेक को जिला पंचायत अध्यक्ष बनाने का सपना संजोए बैठे थे उनका यह सपना अब टूटता दिख रहा है क्योंकि इस सीट को सरकार द्वारा चुनाव नतीजों के बाद महिला के लिए आरक्षित किया जा चुका है। एक दूसरा उदाहरण आप उत्तरकाशी को भी ले सकते हैं जहां की 28 सीटों में से भाजपा के सात सदस्य ही जीतकर आए हैं तथा 21 निर्दलीय प्रत्याशी जीते हैं यहां भी महेंद्र भट्ट अपना जिला पंचायत अध्यक्ष बनाने का दावा कर रहे हैं बड़ी साफ बात है कि इन निर्दलीयों को भाजपा आसानी से अपने पाले में खींच लाई है। भले ही इन निर्दलीय प्रत्याशियों में कुछ अन्य दलों के समर्थित सदस्य भी चुनाव जीतकर आए हो लेकिन इस बार पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष दीपक बिज्लवाण का रास्ता आसान नहीं दिखता है खैर हम सब यह अच्छी तरह से जानते हैं कि जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए होने वाले चुनाव किस तरह हॉर्स ट्रेडिंग होता है और क्या हथकंडे अपनाये जाते हैं। भले ही इस पंचायत चुनाव में भाजपा को जनता ने नकार दिया हो लेकिन वह कांग्रेस को पटखनीं देने के लिए अपना पूरा जोर लगा रही है। कांग्रेस के लिए यह पंचायत चुनाव के नतीजे निश्चित रूप से किसी संजीवनी से कम नहीं है यही कारण है अब कांग्रेस 2027 में एक अच्छे नतीजे की उम्मीद लगाए बैठी हैं। जो स्वाभाविक भी है लेकिन कांग्रेस के नेताओं को इसे लेकर बहुत अधिक खुश होने की भी जरूरत नहीं है। इस चुनाव में कुछ क्षेत्रीय दलों को भी ठीक—ठाक सफलता मिली है वहीं कांग्रेस के नेताओं को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि 2027 के विधानसभा चुनाव में उसका मुकाबला उस भाजपा से होना है जिसे आपदा को भी अवसर में बदलने का हुनर बखूबी आता है। कांग्रेस को इस बात पर बहुत खुश होने की जरूरत नहीं है कि प्रीतम सिंह के बेटे अभिषेक, शूरवीर सिंह सजवाण के बेटे और गोविंद सिंह कुंजवाल की बहू और विनोद डबराल की बेटी कविता सिंह के चुनाव जीतने का मतलब यह है कि जनता कांग्रेस के साथ है क्योंकि उसने विधायक सरिता आर्या के बेटे व विधायक मनोज रावत के बेटे, राम सिंह कैड़ा की बहू, राजेंद्र सिंह भंडारी की पत्नी और महेश जीना के बेटे को चुनाव में हराकर यह सुनिश्चित कर दिया है कि 2027 में कांग्रेस ही जीतेगी या जनता कांग्रेस को ही जिताने जा रही है। हर एक चुनाव का मिजाज अलग होता है हां इतना जरूर है कि कांग्रेस अगर अपने दलीय दलदल से बाहर निकल कर 2027 का चुनाव लड़ी तो उसे राहत जरूर मिल सकती है 2027 का चुनाव त्रिकोणीय होने वाला है इसलिए भी किसी की राह उतनी आसान नहीं रहेगी जैसा लग रहा है।



