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भाजपा में कुछ भी नामुमकिन नहीं

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भले ही देश के आम नागरिक इस बात को लेकर हैरान हों कि देश की राजनीति में हो क्या रहा है और राजनीति के विशेषज्ञ यह समझने में नाकाम हो कि भाजपा आखिरकार करना क्या चाहती है? केंद्रीय स्तर से लेकर राज्यों के स्तर तक किए जाने वाले भाजपा हाई कमान के फैसले भले ही सभी को चौंकाने वाले हो और उनके बारे में कुछ भी समझ पाना संभव न हो लेकिन अब एक बात सभी को समझ आ गई है कि भाजपा के शासनकाल में कुछ भी नामुमकिन नहीं है। अभी पहलगाम में हुए आतंकी हमले से लेकर उत्तराखंड में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव तक कोई भी छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा फैसला इस बात की गवाही देता दिखता है कि भाजपा शासन में कुछ भी नामुमकिन नहीं है। ऑपरेशन सिंदूर जब अपने निर्णायक मुकाम पर था तब अचानक आए सीज फायर या युद्ध विराम के फैसले को लेकर आज तक चर्चाएं जारी है लेकिन इस फैसले के पीछे का सच कोई नहीं जान सका है। देश में 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान संविधान बदलने की चर्चाएं अपने चरम तक सुनाई दी लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा नेता इसे विपक्ष का भ्रामक प्रचार बताते रहे बावजूद इसके कि केंद्र की वर्तमान सरकार बैसाखियों पर चल रही है। देश में संविधान की प्रस्तावना से लेकर धर्मनिरपेक्ष और समाजवाद जैसे शब्दों को हटाने पर बहस जारी है कुछ लोग अभी भी इसे भाजपा सरकार के संविधान बदलने के प्रयासों से ही जोड़कर देख रहे हैं। सच बात यह है कि भाजपा का शासनकाल हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र की अवधारणा की एक प्रयोगशाला बनकर रह गया है। इस सबके लिए एक के बाद एक प्रयोग किया जा रहे हैं। वह चाहे बीजेपी शासित राज्यों में चुनाव से पूर्व मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों तक के चेहरे बदलने की कवायद हो या फिर संगठन में किसी भी तरह के बदलाव की। पहली बार उत्तर प्रदेश में जब भाजपा को सत्ता मिली तब कोई यह नहीं सोच सका था कि योगी आदित्यनाथ यूपी के सीएम बनने जा रहे हैं। राजस्थान से जब वसुंधरा और मध्य प्रदेश से शिवराज सिंह का जब पत्ता साफ हुआ तो कोई भी इसका अंदाजा नहीं लगा सका था। ठीक वैसे ही उत्तराखंड चुनाव हारने के बाद भी पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाया गया था तो सब हैरान रह गए थे। अभी—अभी राज्य प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव भी हमने देखा। प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भटृ को राज्यसभा भेजे जाने के बाद सभी ने यह मान लिया था कि अब उनकी जगह किसी नए चेहरे को यह जिम्मेदारी दी जाएगी लेकिन चुनाव का हाईटेक ड्रामा और दर्जन भर प्रत्याशियों की लाइन में खड़े नेताओं में से किसी का भी नामांकन पत्र न भरना तथा महेंद्र भटृ का इस पद पर रिपीट होना बहुत ही अजब गजब था। सूबे में नई सरकार के गठन से लेकर अब तक कैबिनेट में खाली पड़े पदों का न भरा जाना नेताओं को हैरत को डाले हुए हैं। राज्य में कुछ बड़ा फेर बदल होने वाला है इसकी चर्चा बीते कई महीनो से जारी है लेकिन क्या होने वाला है यह कोई भी नहीं जानता। क्योंकि भाजपा में कुछ भी नामुमकिन नहीं है।

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