इतिहास कभी मरता नहीं है। सत्ता में बैठे जो लोग 50 साल पूर्व 25 जून 1975 कि उस घटना को जब देश ने पहली बार आपातकाल की त्रासदी को भुगता था, लोकतंत्र की जड़े हिला देने वाली घटना बता कर युवाओं से शाह कमीशन की रिपोर्ट पढ़ने का आग्रह कर रहे हैं। जिससे वह कांग्रेस के शासनकाल का सच जान सके, उन नेताओं को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उनके कार्यकाल के 11 साल यानी कि बीते समय के 4000 दिन भी उस इतिहास का हिस्सा बनकर उसी इतिहास की किताब में दर्ज हो चुके हैं जिसमें आपातकाल का इतिहास दर्ज है। शासक भले ही कोई भी रहे सभी के कार्यकाल का एक इतिहास होता है। जो कभी मरता नहीं है। अभी बीते दिनों संसद सत्र के दौरान लोकसभा में बोलते हुए कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने एक बात कही थी कि सत्ता पक्ष के लोगों की कोई बात पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी के प्रसंगों के बिना पूरी नहीं होती है। कांग्रेस ने 50 साल में ऐसा किया वैसा किया वह सब ठीक है लेकिन आप अपने कार्यकाल के 10 सालों पर कभी कोई सवाल—जवाब करने को तैयार क्यों नहीं होते हैं। आपको देश के लोगों को यह बताना चाहिए कि आपने इन 10—11 सालों में क्या—क्या किया है। 2014 के लोकसभा चुनाव के समय से लेकर आज तक आपने देश से और देश की जनता से जो वायदे किए थे उनके बारे में आपको बात करनी चाहिए? 100 दिन के अंदर विदेश में जमा काला धन वापस लाएंगे और हर एक गरीब के बैंक खाते में 10—10 लाख रुपए डालकर देश से गरीबी को मिटा देंगे ? अब तो आपको सत्ता में रहते हुए 4000 दिन हो चुके हैं क्या काला धन वापस आ गया? आपने सत्ता में आने पर बेरोजगारी मिटाने की बात कही थी आप हर साल 2 करोड़ युवाओं को रोजगार देने वाले थे क्या आपने युवाओं को रोजगार दिए आप युवाओं को रोजगार देने की बजाय उन्हे डिग्री लेकर पकोड़े तलने और पकोड़े बेचने को भी रोजगार बताकर उनका मजाक बना रहे हैं। देश जो लघु उघोगों और ग्रह उघोगों से चला, वहां अपने जीएसटी लगाकर छोटे व्यापारियों व व्यवसायियों को कंगाली की दहलीज पर पहुंचा दिया, क्या इतिहास का हिस्सा नहीं है। नोटबंदी का रातों—रात जो फैसला लेकर आपके द्वारा जो देशवासियों को चौंकाने का काम किया गया था उसके पीछे आपका क्या मंसूबा था? इसका क्या फायदा हुआ और क्या नुकसान हुआ इतिहास एक दिन यह सवाल पूछेगा। अपने 11 साल के कार्यकाल में एक भी पत्रकार वार्ता न करने वाले प्रधानमंत्री मोदी से क्या इतिहास यह नहीं पूछेगा कि आपने अपने पूरे कार्यकाल में किसानों, मजदूरों और बेरोजगारों के मन की बात क्यों नहीं सुनी? देश की तमाम स्वायत्त संस्थाएं भले ही वह निर्वाचन आयोग हो या फिर सीबीआई और ईडी हो उनका काम सिर्फ सत्ता के लिए ही काम करना क्यों हो गया। मीडिया जिस लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है वह तो जैसे कोई तमाशा ही बनकर रह गया उसके हिस्से में तो सिर्फ चाटुकारिता के कुछ शेष नहीं बचा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को छीन कर लोकतंत्र को जिंदा रखने का जो तमाशा इस दौर में जारी है वह आखिर कब तक चलेगा या चल सकता है। आरक्षण, महिला सुरक्षा के नाम पर छलावे की राजनीति कब तक चलेगी। सत्ता से सवाल जब देशद्रोह मान लिया है तो वह लोकतंत्र जिसमें सवालों का जवाब देने की बजाय मौन तंत्र को ओढ़ लिया जाए। वह लोकतंत्र भला कैसे लोकतंत्र हो सकता है। लेकिन इतिहास तो हर काल का लिखा ही जाना है और इतिहास कभी किसी को माफ नहीं करता भले ही उसे दौर का शासक कोई भी रहा हो।



