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सवाल आम आदमी के?

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केंद्रीय वित्त मंत्री सीतारमण द्वारा 2025—26 का जो आम बजट पेश किया गया उसे लेकर अब एक तरफ वित्तीय मामलों के विशेषज्ञ और अर्थ शास्त्री उसकी समीक्षा करने में जुटे हैं वहीं संसद में राष्ट्रपति के बजट भाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा में विपक्ष द्वारा उन तमाम सवालों को उठाया जा रहा है जो आम आदमी के जीवन से जुड़े हुए हैं। इस बजट को पेश किए जाने से लेकर अब तक सत्ता पक्ष ने 12 लाख तक की आय पर जीरो आयकर किए जाने पर खूब तालियां बटोरी गई है लेकिन इसकी पूरी समीक्षा के बाद अब कहा जा रहा है कि इसका बहुत कम लोगों को बहुत थोड़ा सा लाभ ही मिलेगा। सरकार का कहना है कि इस आयकर छूट के कारण सरकार की आय में 1 लाख करोड़ की कमी आएगी। बजट के आकार में की गई वृद्धि और आयकर छूट के बाद सरकार जो 1.25 लाख करोड़ का नुकसान होगा उसकी भरपाई सरकार कहां से करेगी? इसका कोई जवाब बजट में नहीं दिया गया। विपक्ष का कहना है कि सरकार कुछ न कुछ अतिरिक्त टैक्स वसूली का मन बनाए बैठी है। संसद में धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान एक सवाल सभी के द्वारा एक स्वर में किया जा रहा है कि इस बजट में सरकार ने बेरोजगारी कम करने और महंगाई को रोकने के लिए क्या कुछ किया है? एक अन्य सवाल यह है कि देश के गरीब लोगों और किसानों के लिए उनकी समस्याओं के समाधान के लिए क्या किया है? मनरेगा में जो 8 करोड़ मजदूर काम करते हैं उनकी मजदूरी में या बजट में एक रूपये की भी बढ़ोतरी नहीं की गई है सरकारी कर्मचारियों की तरह इन मजदूरों को कोई महंगाई भत्ता तो मिलता नहीं है जबकि महंगाई की मार तो उन्हें भी झेलनी पड़ रही है। सच यह है कि मनरेगा मजदूरों को कई मानकों के आधार पर काम भी नहीं मिल पाता है। सरकार द्वारा किसानों की उस मांग पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है जिसे लेकर वह सालों से सड़कों पर संघर्ष कर रहे हैं। उनकी फसलों और उत्पादों के लिए एमएसपी गारंटी कानून लाने की कोई चर्चा तक इस बजट में नहीं है और न उनकी ऋण माफी या किसान सम्मान निधि बढ़ाने की कोई बात कही गई है। किसानों के क्रेडिट कार्ड की लिमिट को तीन लाख से बढ़ाकर 5 लाख कर देने से तो किसानों के और अधिक कर्ज में डूबने का रास्ता ही खुलेगा। भले ही सरकारी आंकड़ों में बेरोजगारी दर घट रही हो लेकिन सच यही है कि अगर कहीं चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की 40 रिक्तियां होती है तो उसके लिए 4 लाख अभ्यर्थी लाइन में खड़े दिखाई देते हैं। बीते एक दशक में बढ़ती महंगाई ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। बजट में सरकार द्वारा इस महंगाई को रोकने के कोई उपाय नहीं किए गए हैं। सरकार द्वारा आयकर स्लैब में बदलाव कर भले ही यह दर्शाया जा रहा है कि उससे पूर्व किसी भी सरकार द्वारा ऐसे बड़े फैसले कभी नहीं किए गए लेकिन सच यह है कि जितनी टैक्स वसूली आम आदमी से वर्तमान सरकार द्वारा की गई है उतनी टैक्स वसूली किसी भी सरकार द्वारा नहीं की गई है। देश की अर्थव्यवस्था को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने और विकसित भारत का सपना दिखाने की बात अर्थव्यवस्था के उस सच को छुपाने के लिए की जा रही है जो अब तक के सबसे खराब दौर में पहुंच चुकी है। जिसका खामियाजा देश के उस 60 फीसदी गरीब व आम आदमी को झेलना पड़ रहा है जो सरकार के मुफ्त के राशन पर जी रहा है। सरकार ने उस आम आदमी के सवालों पर गौर कतई भी नहीं किया है वह सवाल इस बजट के बाद भी सवाल ही बने हुए हैं।

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