पीर पहाड़ की

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राज्य बने भले ही 25 साल का समय बीत गया हो और सरकारी दावों में उत्तराखंड का विकास सरपट दौड़ रहा हो लेकिन क्या पहाड़ वासियों की पीर में कुछ कमी आई है या उसकी पीर आज भी पहाड़ जैसी ही बनी हुई है। अभी विधायक मुन्ना सिंह चौहान का एक इंटरव्यू देखा गया था जिसमें वह पहाड़ के पलायन से लेकर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था और स्वास्थ्य समस्याओं पर अपनी ही सरकार के खिलाफ बड़ी बेबाकी से कहते हैं कि आंकड़ों में भले ही पलायन की स्थिति में सुधार दिख रहा हो और रिवर्स पलायन की बात कही जा रही हो लेकिन यह सब झूठ है। अगर यह सच होता तो भूतिया गांवों और बंद होते स्कूलों की संख्या में निरंतर वृद्धि क्यों हो रही है। उनका साफ कहना है कि राज्य के लोगों की प्रति व्यक्ति आय 2 लाख के पार हो गई है किंतु सरकारी आंकड़ों में बढ़ने वाली यह आय सिर्फ शहरी आबादी तक ही सीमित है। राज्य के दूर—दराज के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों की आय कितनी बढ़ी है? इसका सच जानने वाला कोई नहीं है। ठीक वैसा ही हाल स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा का भी है। इन सुविधाओं का दायरा सिर्फ शहरों तक ही सीमित है पहाड़ के स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रो की क्या स्थिति है इसकी हकीकत एकदम अलग है। एक अन्य वीडियो इन दोनों चर्चाओं के केंद्र में है। टिहरी की जिलाधिकारी स्वाति भदोरिया अपने कार्यालय में बैठी जन समस्याओं को सुन रही है। ग्रामीण क्षेत्र का एक युवक अपनी पेयजल समस्या को लेकर उनके पास पहुंचता है और कहता है कि हम लोग बहुत परेशान हैं बिना पानी के कैसे गुजारा किया जाए। डीएम स्वाति द्वारा उसकी बातें सुनकर विभागीय अधिकारियों को इसकी जानकारी दी जाती है या नहीं? तथा क्या उन्होंने कोई समाधान किया है जैसे सवाल पूछे जाते हैं। इन सवालों का जवाब देने के बीच इस युवक द्वारा बड़ी ही मासूमियत भरे अंदाज में यह भी कह दिया जाता है कि मैडम अभी तक मेरी शादी भी नहीं हुई है। वहां मौजूद तमाम लोग ठहाका लगाते हैं और डीएम स्वाति भी अपनी हंसी नहीं रोक पाती है। लेकिन उस युवक की इस बात के पीछे छिपी वह पहाड़ की एक ऐसी पीड़ा भी सामने उजागर हो जाती है जो पहाड़ के लड़कों को अब बहु न मिलने से जुड़ी हुई है। पहाड़ के लोग अब अपनी बेटियों की शादी भी पहाड़ के ऐसे लड़कों से करने में कतराते हैं जो गांव देहात में रहते हैं। कारण बड़ा स्पष्ट है कि पहाड़ पर आज भी मूलभूत सुविधाओं का बड़ा अभाव है बात सिर्फ रोटी—रोजी तक सीमित नहीं है जिसे बाहर जाकर कमाया जा सकता है। बात शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पानी जैसी मूलभूत समस्याओं की है पहाड़ में बच्चों को अच्छी शिक्षा तथा बीमार को अच्छा इलाज कहां से मिलेगा? कैसे पीने का पानी मिलेगा? आज भी तमाम समस्याएं जस की तस ही बनी हुई है। पहाड़ों से आने वाली तमाम तस्वीरे और खबरें इस बात की पुष्टि भी करती हैं। बीते कुछ समय से पहाड़ में अब लड़कों के लिए लड़की (बहू़)की तलाश भी मुश्किल हो जाने की समस्या चर्चाओं के केंद्र में है। एक आम आदमी भी अब यही चाहता है कि उसकी बेटी की शादी ऐसे लड़के से हो जो किसी शहर में रहता हो और नौकरी पेशा करता हो। जिससे उसकी भावी पीढ़ी पहाड़ों की पहाड़ जैसी इस पीड़ा से निजात पा सके।

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