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लोकतंत्र है कहां?

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बिहार विधानसभा चुनावों के नतीजों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि विपक्षी दल कांग्रेस सहित अन्य तमाम राज्यों के क्षेत्रीय क्षत्रप अब कुछ भी कर लें हर एक चुनाव में जीत भाजपा की गारंटी बन चुकी है। उसे अब चुनाव के मैदान में कोई भी हरा नहीं सकता है इन चुनावों के नतीजों पर और देश की राजनीति पर भले ही कोई कुछ भी कहता रहे लेकिन किसी भी बात का प्रभाव भाजपा और उसके नेताओं पर पड़ने वाला नहीं है, उन्होंने वही करना है जो वह करना चाहते हैं। निर्वाचन आयोग से लेकर न्यायपालिका तक देश में कोई संवैधानिक इस व्यवस्था को नहीं बदल सकती है। अगर सीधे—सीधे बात कही जाए तो बीते एक दशक में भाजपा ने सभी संवैधानिक संस्थाओं से लेकर सामान्य सामाजिक व्यवस्थाओं को अपने अनुकूल बना लिया गया है कि सवाल उठाने और प्रतिरोध करने का सहास भी कोई नहीं कर सकता है। जिस मोदी मीडिया की चर्चा इन दिनों आम हो चली है उसे लेकर अब कोई भ्रांति किसी के मन में नहीं है। आम आदमी के मन में धर्म, संप्रदायों और क्षेत्रवाद को लेकर इतना भय बैठा दिया गया है कि वह आएंगे तो आपकी भ्ौंस ले जाएंगे, दूरबीन से ढूंढ कर आपका मंगलसूत्र भी आपके पास नहीं छोड़ेंगे। चुनाव के दौरान बटोगे तो कटोगे जैसे नारे लोकप्रियता की सभी सीमाओं के पार निकल चुके हैं। भले ही देश की जनता यह ढूंढते रह जाए कि महंगाई कब कम होगी? कब उसके अच्छे दिन आएंगे? कब युवाओं को दो करोड़ नौकरियां मिलेगी और कब किसानों की आय दोगुना होगी ? कब काला धन वापस आएगा और कब भ्रष्टाचार मिटेगा? सच यह है कि अब आम जनता के सभी मुद्दे विमर्श में जा चुके हैं और कोई भी नेता इन मुद्दों पर बात करने को तैयार नहीं है समूचा समाज गरीबी के घोर अंधेरे में जी रहा है। सरकार ने अगर कुछ हासिल किया है तो वह उसकी अपनी काबिलियत है। जिसने भाजपा को विश्व की नंबर वन पार्टी बना दिया है। जिसके खजाने में धन की कोई कमी नहीं है। बीते एक दशक में देश के 40 फीसदी ग्रहस्त अपना सोना गिरवी रखकर गंवा चुके हैं। सत्ता में बैठे लोग दावा करते हैं कि उन्होंने 25 करोड लोगों को गरीबी की रेखा से ऊपर लाने का काम किया है। अभी बिहार चुनाव के दौरान एक करोड़ से अधिक महिलाओं के खातों में 10—10 हजार कैश ट्रांसफर किया गया। अब खबर आ रही है कि सरकार को विश्व बैंक से जो 14 हजार करोड़ रुपया मिला था उसे सरकार ने जनकल्याण योजनाओं में लगाने की बजाय चुनाव जीतने में उड़ा दिया। विपक्ष के नेता संविधान की किताब हाथों में लेकर सालों से यह समझा रहे हैं कि हमारी लड़ाई संविधान और लोकतंत्र बचाने की है। तुम्हारा वोट का अधिकार भी अगर छीन लिया गया तो आपके पास फिर कुछ नहीं बचेगा। क्या देश की जनता को वह यह समझा सके? इसका जवाब बिहार विधानसभाओं के नतीजे है। जिनकी समझ में वोट के बदले 10 हजार रूपया तो आया बाकी कुछ भी नहीं आ सका। दरअसल इसमें भूखी नंगी जनता की भी कोई गलती नहीं है दो माह हाड़ तोड़ मेहनत के बाद भी अगर 10 हजार रूपये न मिल पाए और कोई उन्हें बिना कुछ किये ही 10 हजार रूपये दे दे तो उसे वोट देना तो बनता है। विपक्ष वोट चोरी के आरोप लगाता है तो लगाता रहे। निर्वाचन आयोग चुनाव के दौरान 10—10 हजार रूपये बांटने को चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नहीं मानता है तो कर लो उसका क्या कर सकते हो। न्यायालय ने चुनाव निपटने तक एसआईआर पर फैसला नहीं दिया तो आप क्या कर लोगे। सच यही है कि अब इस व्यवस्था का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। जिसे भी संविधान और लोकतंत्र का ढोल पीटना है पीटता रहे। बदलते भारत में अब इसे आप ढूंढ़ते ही रह जाएंगे।

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