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क्या होगा सूबे की सरकार का?

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उत्तराखंड राज्य के रजत जयंती समारोहों की खुमारी अब उतर चुकी है। सूबे के सत्ताधारी नेताओं को अब अपने भविष्य की चिताओं ने घेर लिया है। आज 14 नवंबर के बाद सूबाई सत्ता में क्या कुछ बड़ा फेर बदल होगा? यह एक ऐसा सवाल है जिसे लेकर सिर्फ विधायक ही नहीं बल्कि मंत्रियों के मन भी बेचैन है। 14 नवंबर को बिहार विधानसभा के नतीजे आने वाले हैं। भाजपा के सूत्रों के अनुसार 14 नवंबर के बाद कभी भी राज्य के मंत्रिमंडल में बड़ा फेर बदल होने को तय माना जा रहा है। इस बात की चर्चाएं तो बहुत पहले से ही हो रही थी कि इस फेरबदल में सिर्फ खाली पड़े पांच मंत्रियों के पदों को ही नहीं भरा जाना है अपितु वर्तमान मंत्रियों में से भी कुछ की छुटृी हो सकती है तथा कुछ अन्य चेहरों को मंत्री बनाया जा सकता है। लेकिन अब बात कुछ और भी आगे बढ़ चुकी है राज्य में गुजरात का फार्मूला भी प्रयोग में लाया जा सकता है और सभी मंत्रियों से इस्तीफा लेकर मंत्रिमंडल का पुनर्गठन किया जा सकता है? ऐसी स्थिति में इस बात की कोई भी गारंटी नहीं दी जा सकती है कि किस—किस की मंत्रिमंडल से छुटृी हो सकती है। इन मंत्रियों और विधायकों के कामकाज का एक सर्वे भी भाजपा द्वारा कराया गया है जिसमें 22 के आसपास विधायक ऐसे हैं जिनका परफॉर्मेंस न्यूनतम से भी निम्न रहा है। कहा यह भी जा रहा है कि अब मंत्री बनने का सपना तो छोड़िए इन विधायकों को 2027 में भाजपा से टिकट मिल पाना भी मुश्किल हो जाएगा। बात अगर विधायकों की की जाए तो आधा दर्जन से भी अधिक पुराने विधायक ऐसे हैं जो मंत्री बनने का सपना संजोय बैठे हैं। इनमें बंशीधर भगत से लेकर बिशन सिंह चुफाल, मुन्ना सिंह चौहान तक कई नेताओं के नाम है। विधायक विनोद चमोली के अलावा ऐसे चेहरों की भी कमी नहीं है जो पहली बार मंत्री बनने की इच्छा रखते हैं। अब जब 2027 के चुनाव बहुत दूर नहीं रहे हैं और मंत्रिमंडल का विस्तार या कहें पुनर्गठन कैसा होगा इसके विषय में इसलिए भी कुछ नहीं कहा जा सकता है क्योंकि भाजपा अब भी नित नए प्रयोग करने में लगी हुई है। कुछ राजनीति के विद्वान इस पर विचार कर रहे हैं कि अगर भाजपा के पक्ष में बिहार के चुनावी नतीजे नहीं रहते हैं तो फिर उत्तराखंड की बात तो छोड़िए भाजपा के शीर्ष नेताओं को अपनी दिल्ली की सरकार बचाने की चुनौती ही इतनी बड़ी हो जाएगी कि उत्तराखंड में किसी बड़े प्रयोग के बारे में सोच पाना भी भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को भारी पड़ जाएगा। बिहार चुनाव में एनडीए द्वारा नीतीश कुमार को सीएम का चेहरा घोषित न किए जाने से जेडीयू और मुख्यमंत्री नीतीश की नाराजगी अब सार्वजनिक हो चुकी है तथा जदयू ने खुद ही नीतीश कुमार को सीएम का चेहरा घोषित कर दिया है। इसे लेकर मतदान से एक दिन पहले ही भाजपा और जदयू के गठबंधन की गांठे ढीली पड़ गई है। बिहार चुनाव के बाद नीतीश का क्या होगा यह तो अलग बात है किंतु बिहार चुनाव के बाद मोदी और शाह का क्या होगा यह सवाल इससे भी अहम हो चुका है। और अगर एनडीए की सरकार बिहार में बन भी गई जिसकी बहुत उम्मीद दिखाई दे रही है तब निश्चित तौर पर उत्तराखंड का वर्तमान सरकार का क्या होगा और 2027 के चुनाव में भाजपा का क्या होगा? यह सबसे बड़ा सवाल होगा।

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