क्या देश की जनता और राजनीतिक दलों का निर्वाचन आयोग से भरोसा उठ चुका है? बिहार चुनाव से पूर्व यहां जो एसआईआर कराई गई है उसे लेकर अदालत में दायर की गई सैकड़ो यचिकाओं तथा एक करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से काटने पर जो बवाल मचा था वह बेवजह नहीं था। कोर्ट द्वारा कड़ी फटकार के बाद बहुत कुछ ऐसा हुआ कि निर्वाचन आयोग को नियम बदलने पड़े। बहुत सारे लोगों के नाम सूची में शामिल करने पड़े और आधार कार्ड को वोटर होने के दस्तावेजों में मान्यता देनी पड़ी। न्यायालय में यह मामला अभी भी विचाराधीन है तथा कोर्ट ने साफ कह रखा है कि अगर उसे किसी भी तरह की गड़बड़ी के सबूत मिलते हैं तो वह चुनावी प्रक्रिया को रद्द भी कर सकता है। इतना सब कुछ होने के बाद भी निर्वाचन आयोग द्वारा अपने कदम वापस नहीं खींचे गए हैं और अब वह 12 उन राज्यों में एसआईआर कराने जा रहा है जहां 2026 में चुनाव होने हैं। निर्वाचन आयोग के इस फैसले का तमाम राज्यों में भारी विरोध किया जा रहा है विपक्ष कांग्रेस से लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कर्नाटक के सीएम स्टालिन तक तथा महाराष्ट्र के उद्धव ठाकरे तक इसके विरोध में खड़े हैं तथा निर्वाचन आयोग को खुली चुनौती दे रहे हैं। विपक्ष द्वारा वोट चोरी के जो आरोप भाजपा की केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग पर लगाये जाते रहे हैं वह अब चुनाव चुराने के आरोपों तक पहुंच चुका है। निर्वाचन आयोग अगर सत्ता पक्ष के साथ मिलकर चुनाव हैकिंग कर रहा है तो ऐसी स्थिति में निर्वाचन आयोग और लोकतंत्र तथा चुनाव का कोई मतलब नहीं रह जाता है। एसआईआर का आशय अगर किसी एक दल की जीत सुनिश्चित करने का काम किया जा रहा है तो इसका विरोध किया जाना स्वाभाविक है। निर्वाचन आयोग द्वारा अपनी प्रेस वार्ताओं और अदालत में पूछे गए सवालों का कोई सटीक जवाब न दिया जाना इस संदेह को और भी अधिक गहरा देने वाला है। दरअसल निर्वाचन आयोग का काम है कि वह सभी दलों के लिए लेवल प्लेईंग फील्ड तैयार करें और शांतिपूर्ण तथा निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराये। लेकिन निर्वाचन आयोग अपनी एसआईआर की प्रक्रिया में इसे प्राथमिकता न देकर लोगों की नागरिकता की जांच पर ज्यादा ध्यान दे रहा है। जिसका निर्वाचन आयोग को कोई अधिकार नहीं है। निर्वाचन आयोग से जब यह पूछा गया कि बिहार एसआईआर में कितने घुसपैठिये पकड़े गए हैं या मिले तो उसके पास इसका कोई जवाब नहीं होता है तो क्या फिर इस एसआईआर का उद्देश्य महज कुछ फर्जी वोटरों के नाम जोड़ना और सही वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से काटकर किसी एक दल को इसका लाभ दिलाने का काम किया जा रहा है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुत्तQ राजीव कुमार के समय से लेकर अब ज्ञानेश कुमार तक आते—आते निर्वाचन आयोग अपने काम करने के गलत तरीकों की वजह से आम लोगों का विश्वास खो चुका है जो लोकतंत्र के लिए चिंतनीय विषय है।




