कल उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में एक ऐसी घटना सामने आई जो कहने के लिए एक मामूली सी घटना हो सकती है लेकिन इस घटना को अगर विस्तार के फलक पर देखने की कोशिश की जाए तो यह देश के बदलते राजनीतिक और सामाजिक परिवेश की उस तस्वीर को दिखाती है जहां जनता के शासन को क्यों जरूरी माना जाता है इस सवाल का जवाब भी मिलता है। दूंन की दीप नगर कॉलोनी की महिलाओं ने प्यास से तंग होकर वंदे भारत जैसी ट्रेन को रोक दिया यह महिलाएं नारा लगा रही थी कि पानी बंद तो फिर ट्रेन भी बंद। महिलाओं के द्वारा जब इस सबसे अधिक रफ्तार वाली ट्रेन पर ब्रेक लगाया गया तो रेल प्रशासन से लेकर दून के जिला प्रशासन तक में हड़कंप मच गया। मुरादाबाद रेल मंडल से लेकर दिल्ली तक के फोन की घंटियां घनघना उठी आधे घंटे में ही अधिकारी मौके पर पहुंच गए और समस्या का समाधान भी निकल आया। प्रशासन द्वारा तुरंत ट्यूबवेल की मोटर रिपेयर करने हुआ टैंकरो की अतिरिक्त आपूर्ति के आश्वासन के बाद वंदे भारत का रास्ता भी साफ हो गया। इस घटना ने मुझे बरबस ही कवि बल्ली सिंह चीमा कि उस कविता की याद दिला दी जिसमें उन्होंने लिखा है कि ट्टले मसाले चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के, अब अंधेरे जीत लेंगे लोग मेरे गांव के, कह रही है झोपड़ी और पूछते हैं खेत भी कब तक लुटते रहेंगे लोग मेरे गांव के। आज सत्ता के साथ प्रशासन भी जन सरोकारों से इतना विरत हो चुका है कि उनको सिर्फ अपने ही हितों की बात सुनाई आती है आम आदमी की हर समस्या को अनसुना किया जाना और उसे टालते रहने के बहाने ढूंढ लिए जाना जैसे कोई रिवायत हो गई हो। सत्ता में बैठे लोगों का हाल तो यह है कि वह जैसे जनता का उत्पीड़न करने, झूठे वायदे और दावे करने के लिए ही है। जिनके बारे में वह आसानी से यहां तक बोल देते हैं कि यह तो एक चुनावी शगुफा था। लोकतंत्र में सिर्फ जनता का मत ही मायने नहीं रखता है, जन भावनाओं की भी उतनी ही महत्ता है। खास बात यह है कि जन समस्याओं को लेकर सवाल करने वालो को देशद्रोही, नक्सली सोच वाले और जिहादी जैसे शब्दों से दबाने और जेल भेजने का डरावा भी दिखाये जाने की घटनाएं अब आम हो चुकी है। तथा सत्ता का विरोध राष्ट्र का विरोध बता दिया जाता है और जब सत्ता से सवाल पूछना भी जुर्म हो जाए तब कुछ शेष नहीं बचता है। लेकिन दून कि यह छोटी सी घटना यह बताने के लिए काफी है कि जनता जब बोलती है तो सब खामोश हो जाते हैं। भारत के पड़ोसी देशों में जेन जे ने जो तख्ता पलट की घटनाएं की है वह इसका उदाहरण है। बात चाहे छात्रों की हो या किसानों की या आम महिलाओं की। अब सभी सवाल लेकर सड़कों पर आने से डरते नहीं है। यह बात हमने पेपर लीक मामले में देखी थी जब आम आदमी, मीडिया, न्यायपालिका और कार्यपालिका सब जगह से निराश हो जाता है तो उसके पास सिर्फ और सिर्फ एक ही विकल्प बचता है और वह है विरोध का झंडा लेकर सड़कों पर अपनी जान की परवाह किए बिना उतरना या फिर डर कर चुपचाप घरों में बैठ जाना। कुछ दिन पहले तक जो लोग देश के लोकतंत्र को लेकर चिंता जाता रहे थे उन्हें चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि अब जनता जाग रही है वह अब सवाल भी करना सीख चुकी है और सवालों का जवाब लेने के तरीके भी उसे पता हो चुके हैं। अब कोई भी अपनी जवाब देही से बच नहीं सकेगा।




