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भीड़ की भेड़ चाल

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एक कहावत है ‘जो बोओगे सो काटोगे, सीधी बात है कि आप बबूल के बाग को बोकर उन पर आम और अनार के फल आने की उम्मीद तो नहीं कर सकते हैं। देश की राजनीति में आज जिस जेन—जी के आंदोलनों की संभावनाएं जताई जा रही हैं या फिर जो हिंदू मुस्लिम अथवा ओवीसी का जो राग अलाप किया जा रहा है अथवा आई लव मोहम्मद की कवायद चल रही है उस सभी के पीछे सोचे समझे राजनीतिक षड्यंत्र ही हैं। भले ही देश के संविधान में सभी धर्म—जाति और संप्रदायों को समान और स्वतंत्रता का अधिकार देने की बात लिखी गई हो लेकिन देश के नेताओं के लिए आजादी के अमृत काल में भी यही मुद्दे राजनीतिक सफलता के सबसे प्रभावी औजार बनाये जा चुके हैं। भले ही अंग्रेजी हुकूमत का यह ट्टडिवाइड एण्ड रूल’ का फार्मूला एक रहा हो लेकिन यहां तो हर एक राजनीतिक दल ने जाति धर्म और संप्रदाय से भी आगे निकल कर क्षेत्र और राष्ट्रवाद को राजनीति का हथियार बना लिया है। अभी कानपुर (उत्तर प्रदेश) से एक समुदाय विशेष द्वारा आई लव मोहम्मद का एक ऐसा अभियान शुरू किया गया है जिसके बारे में कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि इसे इतना उग्र बनाया जा सकता है कि जिस पर राज्यों व देश में संप्रदायों के बीच तलवारे भी खींची जा सकती है लेकिन धन्य है इस देश की राजनीति जिसने इस हिंसा आगजनी और तोड़फोड़ के जरिए उसे उस मुकाम तक पहुंचा दिया है कि लोग एक दूसरे को समाप्त करने पर आमादा हो गए हैं। जय श्री राम कहने से जब किसी को आपत्ति नहीं हो सकती है तो आई लव मोहम्मद कहने पर किसी दूसरे संप्रदाय के लोगों को क्या परेशानी होनी चाहिए। सच भी यही है कि किसी भी धर्म के लोग जिसे चाहे उसे पूजे जिसकी जय जयकार करना चाहे करें। लेकिन धर्म जिस तरह एक निजी मसला है वहां आप ऐसा करके किसी अन्य को नुकसान पहुंचाने का अधिकार नहीं रखते हैं। बरेली में जो बलवा हुआ इस तरह की तोड़फोड़ किसी भी धर्म के नाम पर स्वीकार्य नहीं हो सकती है। अभी 2 दिन पूर्व एक युवक द्वारा सोशल मीडिया पर इस पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी को न तो कोई कानून सही ठहरा सकता है न समाज। जिसने भी यह हरकत की थी पुलिस द्वारा जब उसे गिरफ्तार कर लिया गया और उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही भी की जा रही थी तब फिर इस मुद्दे को लेकर लोगों द्वारा थाने में हंगामा या रास्ता जाम किया जाना गलत ही था जिसके कारण पुलिस को भी एक्शन लेना पड़ा अब 400 से अधिक लोगों पर मुकदमा दर्ज कराया गया है जो कोर्ट कचहरी के चक्कर काटते रहेंगे। यह ठीक है कि नेता और राजनीतिक दलों द्वारा जनता को भड़काने का काम किया जाता है लेकिन एक अच्छे नागरिक होने पर हमें तो यह सोचने की जरूरत है कि हम किसी उन्मादी भीड़ का हिस्सा न बने। जब तक आम आदमी अपने बुद्धि और विवेक से फैसला नहीं लेंगे और क्या उचित है या अनुचित है इस पर उनकी राय स्पष्ट नहीं होगी इस समस्या का समाधान संभव नहीं है।

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