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लोकप्रियता, आयोजित या प्रायोजित

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल अपनी उम्र के 75 साल का सफर पूरा कर लिया। बीते 11 सालों से वह देश के प्रधानमंत्री पद पर आसीन हैं स्वाभाविक है कि ऐसा कोई नेता अगर अपनी ही जयंती दिवस मना रहा है तो देश—विदेश से बधाइयो का तांता तो लगा ही रहा होगा। हमने भी उनकी दीर्घायु व अच्छे स्वास्थ्य की कामना की। लेकिन आज मीडियां सारे दिन देश के यशस्वी प्रधानमंत्री के 75 में जन्मदिन पर आयोजन के उन कार्यक्रमों के लाइव टेलीकास्ट में जुटा था जो मध्य प्रदेश में आयोजित किये जा रहे थे वहीं से कुछ ऐसी तस्वीरें भी सामने आई कि उनके कार्यक्रम से पूर्व एक भाजपा नेता वहां जमा भीड़ को इस बात की ट्रेनिंग दे रहा है कि जब मोदी मंच पर आए तब उन्हें क्या करना है? पहले तालियों से उनका स्वागत करना है। नेताजी उस भीड़ से ताली बजवाते हैं फिर कहते हैं मजा नहीं आया और जोर से बजाइये। फिर कहते हैं कि अब नारे लगाइए नारे तो दिल से निकलते है बोलिए मोदी—मोदी—मोदी इसके साथ ही वह यह भी कहते हैं कि मैं आपको डायरेक्शन नहीं दे रहा हूं। यह सब आपको खुद करना है। मोदी जैसे नेता जिन्हें विश्व गुरु कहा जाता है क्या अब इस तरह के प्रायोजित प्रचार की जरूरत पड़ रही है? यह सवाल हैरान करने वाला है। एक अन्य बात जो सामने आई है वह है उनके जन्मदिन पर इंस्टाग्राम जहां पहले स्थान पर हेसटेक है हैप्पी बर्थडे कर रहा था तो वहीं दूसरे नंबर था राष्ट्रीय बेरोजगारी दिवस जो देश की एक अंतहीन समस्या बन चुकी है। जिसका कोई समाधान संभव नहीं दिख रहा है। 2024—25 में देश में बेरोजगारी की दर 30 फीसदी पर हो गई है। सरकारों द्वारा इस छिपाने के लिए नियुक्तियों के पत्र जो कभी डाक द्वारा पहुंचते थे वह मुख्यमंत्री द्वारा समारोह का आयोजन कर बांटे जा रहे हैं। पीएम मोदी ने बेरोजगारों को 2 करोड़ रोजगार हर वर्ष देने का जो वायदा किया था वह शगुफा साबित हो गया है। इसे लेकर बेरोजगारों में इस कदर आक्रोश है कि आज जब मोदी के जन्मदिन पर एक तरफ लखनऊ में बेरोजगार मेले में पहुंचे युवा सरकार व नेताओं को इस आयोजन के लिए पानी पी—पी कर कोस रहे थे वहीं सोशल मीडिया पर कमेंट करने वाले नौकरी चोर गद्दी छोड़ जैसे कमेंट कर रहे थे। और मोदी के जन्मदिन समारोह को जुमला दिवस मनाने की राय दे रहे थे। अब बेरोजगारी का दंश झेल रही देश के यह युवा आबादी जो 65 से 70 करोड़ के बीच है अब करे भी तो क्या करें। अब आते हैं एक तीसरी खबर पर जो मीडिया से जुड़ी हुई है। मोदी के 75वें जन्मदिन को यादगार बनाने के लिए आज मीडिया के लिए सरकारी खजाने का मुंह भी बड़ी उदारता के साथ खोल दिया गया हिंदी के कुछ बड़े अखबारों से लेकर अंग्रेजी तक तमाम अखबारों में पूरे पूरे पेज के रंगीन से लेकर ब्लैक एंड व्हाइट तक विज्ञापनों की ऐसी भरमार थी कि खबरों के लिए कहीं जगह ही नहीं बची थी। अगर इन विज्ञापनों में किए गए खर्च का अनुमान लगाया जाए तो वह उत्तराखंड राज्य के आपदा पीड़ितों को प्रधानमंत्री द्वारा दी गई धनराशि से भी 2 गुना तक अधिक हो सकती है। सवाल यह है कि यह कैसी लोकप्रियता है? और कैसी व्यवस्था है? जहां सब कुछ प्रायोजित है। अब तक योजनाओं के लाभार्थियों से उनकी वार्ताओं पर सवाल उठाते थे कि सब कुछ पूर्व निर्धारित किया हुआ होता है लेकिन यहां तो ऊपर से लेकर नीचे तक सब कुछ दिखावा ही दिखावा और प्रायोजित है। सवाल यह है कि 2014 में मोदी जी को लाने के नारे वाली वह उनकी लोकप्रियता 11 सालों में कैसे और कहा लुप्त हो गई।

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