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सत्ता की विश्वसनीयता जरूरी

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इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के युवाओं तथा गरीब व छोटे—मोटे व्यवसाईयों की और किसानों की समस्याओं को लेकर कुछ ज्यादा ही बेचैन दिखाई दे रहे हैं अभी कुछ दिन पहले उन्होंने देश के युवाओं और एमएसएमई क्षेत्र के लोगों को भरोसा देते हुए कहा था कि वर्तमान समय में सभी राष्ट्र अपने हितों को प्राथमिकता देते हुए काम कर रहे हैं तथा वह भी देश के युवाओं व छोटे व्यापारियों को सर्वाेच्च प्राथमिकता देंगे। राष्ट्र हित में सभी को एकजुट होकर काम करने की नसीहत भी उनके द्वारा दी गई। बीते कल उन्होंने देश के किसानों के हितों के साथ कोई समझौता न करने की बात ही नहीं कहीं बल्कि यहां तक कहा कि इसके लिए अगर उन्हें व्यक्तिगत और निजी तौर पर भी कोई कुर्बानी देनी पड़ती है तो वह उसके लिए भी तैयार है। उनकी इन तमाम बातों को सुनकर ऐसा लगता है कि जैसे वह फिर से एक नए रूप में राजनीति में अवतरित हुए हैं और अब वह देश के तमाम युवा बेरोजगारों, किसानों और लघु एवं सूक्ष्म उघमियों के कल्याण को लेकर अत्यंत ही बेचैन है। देश के लोग उनकी बात पर भरोसा ही नहीं कर पा रहे हैं। बीते 10 सालों से उनके नेतृत्व वाली भाजपा सरकार केंद्रीय सत्ता में है। उनके कार्यकाल की शुरुआत ही ट्टअच्छे दिन आने वाले हैं, से हुई थी। उनके द्वारा ही देश के लोगों से यह वायदा किया गया था कि सत्ता में आने के 100 दिनों के अंदर विदेशों में जमा काले धन को वापस लाया जाएगा और देश के हर गरीब के खाते में 15—15 लख रुपए डाले जाएंगे। लेकिन सत्ता में आने के बाद जब भाजपा के नेताओं ने सालों साल इस पर एक बार भी बात नहीं की गई तो लोगों को पूछना तो था ही कि उस काले धन का क्या हुआ। तब खुद गृहमंत्री अमित शाह ने ही इसे चुनावी शगुफा बता दिया गया। दो करोड़ युवाओं को हर साल रोजगार देने की बात भी किसी और ने नहीं कही थी और न देश के किसानों की आय दो गुना करने का वायदा विपक्ष के नेताओं द्वारा किया गया था। सत्ता और सरकार में शीर्ष पर बैठे नेताओं ने ही किया था, क्या इन वायदों को सरकार ने पूरा किया? और अगर नहीं किया तो देश के लोग उन बातों पर कैसे भरोसा कर ले, जो अब उनके द्वारा की जा रही है। लोग अब इन्हें भी सत्ता में बैठे लोगों की सगूफेबाजी बता या समझ रहे हैं तो इसमें उनका क्या दोष है। देश में वर्तमान सरकार द्वारा जो नोटबंदी का फैसला काले धन और आतंकवाद के सफाये के लिए किया गया था उस काले धन और आतंकवाद का सफाया भले ही न हुआ हो लेकिन इस देश के एमएसएमई क्षेत्र का सफाया जरूर हो गया। जिनके हितों के लिए वर्तमान समय में सरकार में शीर्ष पर बैठे नेता बड़ा बलिदान देने का दावा कर रहे हैं। जिन देश के किसानों की न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी का कानून लाने की एकमात्र मांग को सरकार ने उनके सालों सड़क पर धरना देने और 700 से अधिक लोगों की जान देने पर भी नहीं माना, आज उसके नेता किसानों के हितों से कोई समझौता न करने की बात कह रहे हैं तो उस पर भला कोई कैसे भरोसा कर सकता है। सरकार ने आज जनता का भरोसा खो दिया है तो इसके लिए कोई और नहीं खुद सत्ता में बैठे नेता ही जिम्मेदार है। कोई भी व्यक्ति या सत्ता अपनी ऊंची आवाज से सच को खामोश तो कर सकती है लेकिन सच की आवाज अगर किसी देश आवाम द्वारा उठाई जाती है तो झूठ पर टिकी सत्ता की बड़ी से बड़ी और बुलंद इमारत भी हिलने लगती है। इस नैसर्गिक सत्य को सत्ता को स्वीकार करने की भी जरूरत है। कोई सत्ता झूठ के सहारे बहुत लंबे समय तक कायम नहीं रह सकती है। किसी की सत्ता सिर्फ तब तक कायम रहती है जब तक सत्ता पर आम आदमी का भरोसा कायम रहता है।

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