August 7, 2026जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि जेनरेशन-जी ईमानदार है, देशभक्त है और समाज के लिए कुछ करना चाहती है,तो यह केवल युवाओं की प्रशंसा नहीं थी। यह उस पीढ़ी के बारे में एक वैचारिक घोषणा भी थी, जिसे लेकर वर्षों से दो परस्पर विरोधी धारणाएँ बनाई जाती रही हैं। एक धारा उसे मोबाइल में खोई हुई, आत्मकेंद्रित और क्षणभंगुर मानती है, जबकि दूसरी धारा उसे नए भारत की सबसे बड़ी शक्ति बताती है। लेकिन प्रश्न यह नहीं है कि जेन जी देशभक्त है या नहीं। असली प्रश्न यह है कि देशभक्ति की परिभाषा किसके हाथ में है? हर युग अपनी युवा पीढ़ी को अपने ढंग से परिभाषित करता है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय देशभक्ति अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष थी। आपातकाल के दौर में लोकतंत्र की रक्षा देशभक्ति थी। उदारीकरण के बाद आर्थिक प्रगति को राष्ट्रनिर्माण का पर्याय माना गया। आज डिजिटल युग में देशभक्ति का चेहरा बदल चुका है। वह कभी सीमा पर सैनिक के साहस में दिखाई देती है, तो कभी प्रयोगशाला में वैज्ञानिक के शोध में, कभी खेत में किसान के श्रम में, तो कभी स्टार्टअप शुरू करने वाले युवा के जोखिम में। यही कारण है कि जेन जी की देशभक्ति को केवल नारों, प्रतीकों या सोशल मीडिया अभियानों से नहीं समझा जा सकता। यह पहली पीढ़ी है जिसने दुनिया को अपनी हथेली पर देखा है। इसके सामने केवल भारत नहीं, पूरा विश्व खुला है। यह वैश्विक अवसरों के बीच पलती है, लेकिन स्थानीय पहचान भी खोजती है। यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर काम करती है, लेकिन अपने गाँव के जलस्रोत और पहाड़ की संस्कृति को बचाने की बात भी करती है। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की वास्तविकता है। दरअसल, जेन जी राष्ट्र को विरासत की तरह नहीं, बल्कि परियोजना की तरह देखती है। उसके लिए भारत केवल इतिहास नहीं, बल्कि भविष्य भी है। यही सोच उसे पहले की पीढ़ियों से अलग बनाती है। फिर भी एक खतरा है। डिजिटल युग ने सूचना का लोकतंत्रीकरण तो किया, लेकिन सत्य का नहीं। आज सबसे तेजी से फैलने वाली चीज विचार नहीं, प्रतिक्रिया है। सबसे अधिक बिकने वाली वस्तु तथ्य नहीं, भावनाएँ हैं। एल्गोरिद्म नागरिक नहीं बनाते, उपभोक्ता बनाते हैं। ऐसे समय में युवा के सामने सबसे बड़ी चुनौती देशभक्त होना नहीं, बल्कि विवेकशील देशभक्त बने रहना है। यही वह स्थान है जहाँ शिक्षा की भूमिका राजनीति से बड़ी हो जाती है। यदि विश्वविद्यालय प्रश्न पूछना बंद कर दें, यदि संवाद की जगह शोर ले ले, यदि असहमति को राष्ट्रविरोध और सहमति को राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र बना दिया जाए, तो किसी भी पीढ़ी की बौद्धिक स्वतंत्रता संकट में पड़ जाएगी। मोहन भागवत का कथन युवाओं में विश्वास प्रकट करता है। यह स्वागतयोग्य है। लेकिन विश्वास तभी सार्थक होता है जब उसके साथ अवसर भी दिए जाएँ। यदि एक युवा परीक्षा की तैयारी करे और पेपर लीक हो जाए, यदि प्रतिभा बेरोजगारी में बदल जाए, यदि ईमानदारी व्यवस्था के सामने हार जाए, तो केवल प्रशंसा उसके भविष्य का निर्माण नहीं कर सकती। राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं बनता, वह संस्थाओं से बनता है और संस्थाएँ केवल कानून से नहीं, बल्कि नागरिकों के चरित्र से चलती हैं। इसलिए यदि जेन जी को सचमुच राष्ट्रनिर्माता बनाना है, तो उसे केवल राष्ट्रप्रेम नहीं, संस्थाओं पर विश्वास, संविधान के प्रति प्रतिबद्धता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक संवेदनशीलता और नैतिक साहस भी देना होगा। आज राजनीति युवाओं को मतदाता के रूप में देखती है, बाजार उन्हें ग्राहक के रूप में और सोशल मीडिया उन्हें डेटा के रूप में। लेकिन राष्ट्र उन्हें नागरिक के रूप में देखता है। नागरिक और उपभोक्ता के बीच का यही अंतर किसी भी सभ्यता की दिशा तय करता है। इसलिए जेन जी की सबसे बड़ी परीक्षा यह नहीं होगी कि वह किस दल के साथ खड़ी है। उसकी सबसे बड़ी परीक्षा यह होगी कि वह सत्य के साथ कितनी देर तक खड़ी रह सकती है। वह लोकप्रियता और नैतिकता में किसे चुनती है। वह भीड़ का हिस्सा बनती है या समाज का विवेक। भारत का भविष्य संसद से उतना तय नहीं होगा, जितना उन युवाओं के मन से होगा जो आज मोबाइल स्क्रीन पर दुनिया देख रहे हैं। यदि वह ईमानदारी, परिश्रम और विवेक को अपना धर्म बना लें, तो उनकी देशभक्ति किसी प्रमाणपत्र की मोहताज नहीं होगी। राष्ट्र की सबसे बड़ी सुरक्षा सीमा पर तैनात सैनिक से शुरू होती है, लेकिन उसका स्थायी भविष्य उस युवा के चरित्र पर टिकता है, जो कल इस देश की राजनीति, न्यायपालिका, विश्वविद्यालय, मीडिया और समाज का नेतृत्व करेगा। इसलिए प्रश्न यह नहीं कि जेन जी देशभक्त है या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या हमारा समाज ऐसी परिस्थितियाँ बना रहा है, जहाँ उसकी देशभक्ति केवल भावना न रहे, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की जीवित शक्ति बन सके।