भारत और चीन के रिश्तों में लंबे समय से जमी बर्फ अब कुछ पिघलती दिखाई दे रही है। 12 सितंबर को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात ने इस संभावना को बल दिया है कि दोनों एशियाई शक्तियां टकराव की जगह संवाद और सहयोग की नई राह तलाश सकती हैं। दोनों नेताओं ने सीमा विवाद के समाधान की दिशा में आगे बढ़ने, मौजूदा समझौतों का पालन करने और व्यापार, कारोबार, सांस्कृतिक संपर्क तथा लोगों की आवाजाही बढ़ाने पर जोर दिया। लेकिन सवाल यह है कि क्या मोदी-शी की व्यक्तिगत केमिस्ट्री वास्तव में उस अविश्वास को खत्म कर सकती है, जिसने 2020 के गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के संबंधों को गहरे संकट में डाल दिया था? इस सवाल का जवाब फिलहाल जल्दबाजी में देना ठीक नहीं होगा। कूटनीति में हाथ मिलाना आसान है, लेकिन भरोसा कायम करना कठिन। भारत और चीन के बीच संबंध केवल दो नेताओं के व्यक्तिगत संबंधों पर निर्भर नहीं हैं। इनके केंद्र में करीब 3,800 किलोमीटर लंबी विवादित सीमा, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैन्य तैनाती, व्यापार असंतुलन, अरुणाचल प्रदेश को लेकर मतभेद और क्षेत्रीय भू-राजनीति जैसे जटिल मुद्दे हैं। फिर भी वर्तमान परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगस्त 2026 में भारत और चीन के विशेष प्रतिनिधियों की सीमा वार्ता के 25वें दौर में दोनों पक्षों ने सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने तथा सीमा प्रश्न के उचित, तर्कसंगत और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान की दिशा में बातचीत आगे बढ़ाने पर सहमति जताई थी। यानी मोदी-शी मुलाकात कोई अचानक पैदा हुआ घटनाक्रम नहीं है, बल्कि पिछले कुछ समय से चल रही सावधानीपूर्ण कूटनीतिक प्रक्रिया की अगली कड़ी है। भारत का दृष्टिकोण स्पष्ट है कि सीमा पर शांति और स्थिरता व्यापक संबंधों के विकास की बुनियादी शर्त है। प्रधानमंत्री मोदी ने मुलाकात में भी इस बात पर जोर दिया कि दोनों देशों को सीमा संबंधी मौजूदा समझौतों और सहमतियों का पालन करना चाहिए। साथ ही दोनों नेताओं ने सीमा प्रश्न के निष्पक्ष, तर्कसंगत और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान के प्रति प्रतिबद्धता जताई। यही वह बिंदु है जहां दोनों देशों की दोस्ती की असली परीक्षा होगी। आर्थिक संबंध सुधरें, उड़ानें बढ़ें, कारोबार बढ़े और सांस्कृतिक संपर्क मजबूत हों, यह सब स्वागतयोग्य है। मगर सीमा पर भरोसा मजबूत हुए बिना संबंधों की सामान्य स्थिति अधूरी ही रहेगी। 2024 के बाद दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव कम हुआ और 2025-26 में राजनीतिक तथा आर्थिक संपर्क भी बढ़े हैं। प्रत्यक्ष उड़ान सेवाएं बहाल हुई हैं और कैलाश मानसरोवर यात्रा भी फिर शुरू हुई है। भारत और चीन के बीच आर्थिक संबंध एक ऐसा क्षेत्र हैं जहां दोनों देशों के हित एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। 2025 में द्विपक्षीय व्यापार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा, लेकिन इसके साथ भारत का व्यापार घाटा भी बहुत बड़ा है। चीन भारत के लिए महत्वपूर्ण औद्योगिक और विनिर्माण आयात का स्रोत बना हुआ है। इसलिए नई दिल्ली के लिए चीन से संबंध सुधारने का अर्थ केवल राजनीतिक सद्भाव नहीं, बल्कि आपूर्ति श्रृंखला, विनिर्माण, तकनीक और बाजार पहुंच जैसे व्यावहारिक मुद्दों को भी साधना है। दूसरी ओर भारत चाहता है कि व्यापार संबंध अधिक संतुलित हों और भारतीय उत्पादों के लिए चीनी बाजार में बेहतर तथा पूर्वानुमेय पहुंच मिले। दोनों नेताओं ने हालिया वार्ता में व्यापार असंतुलन और आपूर्ति शृंखला से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की। मोदी और शी की मुलाकातों में व्यक्तिगत संवाद और राजनीतिक समझ का अपना महत्व है। दोनों नेताओं के बीच पिछले दो वर्षों में कई उच्चस्तरीय संपर्क हुए हैं और संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी है। चीनी पक्ष ने भी दोनों देशों को साझेदार के रूप में देखने पर जोर दिया है। लेकिन भारत-चीन संबंधों का भविष्य केवल मोदी और शी की केमिस्ट्री से तय नहीं होगा। यह भरोसे के संस्थागत तंत्र, सीमा पर स्थायी शांति, सैन्य तनाव कम करने के उपायों, व्यापार संतुलन और एक-दूसरे की रणनीतिक चिंताओं के सम्मान से तय होगा। भारत को न तो चीन के साथ स्थायी टकराव को अपनी नियति मानना चाहिए और न ही महज कूटनीतिक मुस्कान को स्थायी दोस्ती का प्रमाण। चीन के साथ संबंधों में सहयोग और सावधानी दोनों साथ चलने होंगे। दुनिया इस समय तेजी से बदल रही है। वैश्विक अर्थव्यवस्था, आपूर्ति श्रृंखलाओं, पश्चिम एशिया के संघर्षों और बदलती वैश्विक शक्ति-समीकरणों के बीच भारत और चीन दोनों के सामने अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखने की चुनौती है। ऐसे समय में दुनिया की दो बड़ी आबादी वाले देशों के बीच संवाद का रास्ता खुलना केवल द्विपक्षीय हित में नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है। इसलिए मोदी-शी मुलाकात को दोस्ती की अंतिम मंजिल नहीं, बल्कि भरोसा बहाल करने की नई शुरुआत के रूप में देखना अधिक यथार्थवादी होगा। ड्रैगन के साथ रिश्तों में भारत को अपनी आंखें खुली रखकर आगे बढ़ना होगा। सीमा पर शांति, आर्थिक हितों की सुरक्षा और राष्ट्रीय संप्रभुता से समझौता किए बिना सहयोग के दरवाजे खोलना ही व्यावहारिक कूटनीति है। यदि संवाद जमीन पर भी सकारात्मक परिणाम देने लगे, तो मोदी और शी की मुलाकात वास्तव में भारत-चीन संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत साबित हो सकती है। लेकिन इसका फैसला हाथ मिलाने की तस्वीर नहीं, सीमा पर शांति और व्यवहार में बदलाव करेगा।




