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दरवाजे बंद, सवाल कौन पूछेगा?

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सरकारी स्कूलों के दरवाजे पर अगर ताला नहीं भी लगा हो, लेकिन वहां पहुंचने के लिए अनुमति की दीवार खड़ी कर दी जाए, तो यह सिर्फ प्रवेश का मामला नहीं रह जाता। यह पारदर्शिता, जवाबदेही और जनता के सवाल पूछने के अधिकार का सवाल बन जाता है। राजस्थान और उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों, पत्रकारों, यूट्यूबर्स, सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं और सिविल सोसाइटी प्रतिनिधियों के प्रवेश को नियंत्रित करने वाले आदेशों को चुनौती दी गई थी। इन प्रतिबंधों का असर केवल किसी पत्रकार के स्कूल में जाने तक सीमित नहीं है। मामला फोटो, वीडियो, इंटरव्यू, आडियो रिकार्डिंग और लाइवस्ट्रीमिंग तक पहुंचता है। सरकारों का अपना तर्क हो सकता है। स्कूल बच्चों के लिए सुरक्षित स्थान हैं। उनकी निजता की रक्षा जरूरी है। बिना अनुमति किसी बच्चे की तस्वीर या वीडियो बनाना उचित नहीं हो सकता। स्कूल परिसर को राजनीतिक प्रचार, तमाशे या अनधिकृत गतिविधियों का केंद्र भी नहीं बनने दिया जाना चाहिए। लेकिन सुरक्षा के नाम पर पारदर्शिता को कैद नहीं किया जा सकता। यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल है। अगर किसी सरकारी स्कूल की छत टपक रही है, बच्चे जर्जर कमरों में पढ़ रहे हैं, शौचालय बंद हैं, शिक्षक नहीं हैं या सरकारी योजनाओं का लाभ बच्चों तक नहीं पहुंच रहाकृतो इन सवालों को सामने कौन लाएगा? विभागीय रिपोर्ट अपनी जगह है, लेकिन लोकतंत्र में स्वतंत्र निगरानी की भी अपनी भूमिका है। पत्रकार का काम केवल प्रेस विज्ञप्तियां छापना नहीं है। उसका काम सत्ता और व्यवस्था से सवाल पूछना भी है। आज पत्रकार के साथ कैमरा है, कल वही काम कोई नागरिक अपने मोबाइल से कर सकता है। सोशल मीडिया ने सूचना के लोकतंत्रीकरण को और व्यापक बनाया है। इसका मतलब यह नहीं कि हर व्यक्ति को स्कूल में जाकर मनमानी करने की छूट मिलनी चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह जरूर है कि नियम ऐसे हों जो सुरक्षा सुनिश्चित करें, सूचना पर पहरा नहीं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका पर सुनवाई से इनकार को यह समझना भी गलत होगा कि अदालत ने इन सभी प्रतिबंधों को संविधानसम्मत घोषित कर दिया है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक अदालत ने अनुच्छेद 32 के तहत याचिका पर विचार करने से इनकार किया। यह प्रतिबंधों की संवैधानिक वैधता पर विस्तृत फैसला नहीं है। यहीं सरकारों की असली परीक्षा शुरू होती है। बच्चों की सुरक्षा और सरकारी व्यवस्था की पारदर्शिता दोनों साथ चल सकते हैं। इसके लिए स्पष्ट व्यवस्था बनाई जा सकती है। पत्रकारों के लिए पूर्व अनुमति की सरल प्रक्रिया हो। बच्चों की पहचान और निजी जानकारी सुरक्षित रखी जाए। फोटो-वीडियो में सहमति और गोपनीयता के नियम लागू हों। स्कूल में शूटिंग के लिए समय और स्थान निर्धारित हो। लेकिन इन नियमों का इस्तेमाल स्कूल की बदहाली छिपाने के औजार के रूप में नहीं होना चाहिए। क्योंकि सरकारी स्कूल किसी निजी कंपनी की संपत्ति नहीं हैं। वह जनता के पैसे से चलते हैं। वहां पढ़ने वाले बच्चे समाज के सबसे बड़े हिस्से से आते हैं। उनके स्कूल की स्थिति सिर्फ शिक्षा विभाग का विषय नहीं, पूरे समाज का विषय है। विडंबना देखिए सरकारें डिजिटल इंडिया की बात करती हैं, सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी उपलब्धियां जनता तक पहुंचाती हैं, सरकारी योजनाओं के वीडियो बनाती हैं और प्रचार के लिए डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल करती हैं। लेकिन जब कोई नागरिक या पत्रकार उसी डिजिटल माध्यम से व्यवस्था की कमियां दिखाना चाहे तो दरवाजे पर अनुमति की पट्टी लगा दी जाती है। यह दोहरा रवैया लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहज सवाल पैदा करता है। हां, हर यूट्यूबर पत्रकार नहीं है। हर सोशल मीडिया पोस्ट पत्रकारिता नहीं है और हर कैमरा लेकर स्कूल में पहुंचने वाले व्यक्ति को प्रवेश देना भी उचित नहीं। लेकिन समाधान पूर्ण प्रतिबंध नहीं, जिम्मेदार नियमन है। सरकार चाहे तो मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए अलग व्यवस्था बनाए और अन्य नागरिकों के लिए भी पारदर्शी अनुमति प्रणाली रखे। शिकायतों और निरीक्षण के लिए स्वतंत्र व्यवस्था हो। स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं की जानकारी सार्वजनिक की जाए। इससे कैमरे के पहुंचने की जरूरत ही कई मामलों में कम हो जाएगी। क्योंकि सबसे अच्छा स्कूल वह नहीं है जिसे कैमरे से छिपाया जा सके। सबसे अच्छा सरकारी स्कूल वह है जिसे कैमरे के सामने भी अपनी व्यवस्था पर शर्मिंदा न होना पड़े। आज सवाल पत्रकार या यूट्यूबर के स्कूल में प्रवेश का नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या सरकार अपने स्कूलों को जनता की नजर से बचाना चाहती है या जनता के भरोसे के लायक बनाना चाहती है? दरवाजे बंद करने से तस्वीरें जरूर कम होंगी। लेकिन सवाल खत्म नहीं होंगे और लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति सवालों का होना नहीं, बल्कि सवाल पूछने वालों के लिए दरवाजे बंद कर देना है।

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