उत्तराखंड के लिए सेना केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही देशसेवा की परंपरा है। प्रदेश के हजारों युवा आज भी सेना की वर्दी पहनने का सपना देखते हैं। ऐसे में अग्निवीर योजना के बाद युवाओं के मन में उठ रहे सवालों और भविष्य की चिंता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। राज्य सरकार की ओर से अग्निवीर प्रकोष्ठ की पहल इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। हालांकि इसकी सफलता इस बात से तय होगी कि यह प्रकोष्ठ कितनी तेजी और गंभीरता से युवाओं की वास्तविक समस्याओं का समाधान करता है। अग्निवीर व्यवस्था ने सेना में भर्ती की तैयारी कर रहे युवाओं के सामने अवसर का नया रास्ता खोला है, लेकिन चार वर्ष की सेवा के बाद भविष्य को लेकर कई सवाल भी हैं। उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहां सेना में भर्ती को रोजगार के साथ सामाजिक प्रतिष्ठा और देशसेवा से जोड़कर देखा जाता है, इन सवालों की गंभीरता और बढ़ जाती है। इसलिए अग्निवीर प्रकोष्ठ का दायित्व केवल सूचना उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसे युवाओं के लिए भर्ती से लेकर सेवा और सेवा के बाद रोजगार तक का सेतु बनना होगा। सबसे बड़ी जरूरत यह है कि प्रकोष्ठ की कार्यप्रणाली स्पष्ट और परिणाम आधारित हो। प्रदेश के पर्वतीय जिलों में सेना की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए बेहतर प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए। दूरदराज के गांवों से आने वाले युवाओं के सामने कोचिंग, खेल मैदान, आवास और आर्थिक संसाधनों की कमी जैसी व्यावहारिक चुनौतियां हैं। केवल देहरादून या बड़े शहरों में सुविधाएं उपलब्ध करा देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। प्रकोष्ठ को ब्लाक और जिला स्तर तक पहुंच बनानी होगी। इसके साथ ही सेवा पूरी करने वाले अग्निवीरों के लिए सरकार को अभी से स्पष्ट रोजगार नीति तैयार करनी चाहिए। पुलिस, वन विभाग, आपदा प्रबंधन, सुरक्षा सेवाओं और अन्य क्षेत्रों में उनकी सैन्य दक्षता का उपयोग किया जा सकता है। निजी क्षेत्र को भी इस दिशा में जोड़ा जाना चाहिए। आखिर सेना से प्रशिक्षित युवा अनुशासन, नेतृत्व, शारीरिक दक्षता और विपरीत परिस्थितियों में काम करने की क्षमता लेकर बाहर आता है। यह किसी भी संस्थान के लिए उपयोगी मानव संसाधन हो सकता है। उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन का क्षेत्र भी अग्निवीरों के कौशल का प्रभावी उपयोग कर सकता है। भूस्खलन, बाढ़, बादल फटने और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से जूझने वाले प्रदेश में प्रशिक्षित और अनुशासित युवाओं की जरूरत हमेशा रहेगी। यदि अग्निवीरों को आपदा प्रबंधन, पर्वतीय बचाव, ड्रोन संचालन, प्राथमिक चिकित्सा और अन्य उपयोगी कौशल से जोड़ा जाए तो उनके लिए रोजगार के साथ प्रदेश की आपदा प्रबंधन क्षमता भी मजबूत होगी। लेकिन इसके लिए प्रकोष्ठ को सरकारी घोषणाओं की फाइलों से बाहर निकलना होगा। युवाओं को यह पता होना चाहिए कि वह अपनी समस्या लेकर कहां जाएं, किस अधिकारी से संपर्क करें और उन्हें किस प्रकार की सहायता मिलेगी। शिकायत और सुझाव के लिए प्रभावी व्यवस्था, जिला स्तर पर नोडल अधिकारी तथा नियमित फीडबैक सिस्टम जरूरी है। यह भी महत्वपूर्ण है कि अग्निवीर प्रकोष्ठ को राजनीतिक प्रचार का माध्यम न बनने दिया जाए। युवाओं के भविष्य से जुड़ा विषय दलगत राजनीति से ऊपर होना चाहिए। सरकार को उपलब्धियों का प्रचार करने के बजाय परिणाम सामने रखने चाहिए और विपक्ष को भी केवल विरोध तक सीमित रहने के बजाय बेहतर नीति के लिए सुझाव देने चाहिए। उत्तराखंड के युवाओं ने सेना में जाकर देश की सीमाओं की रक्षा की है। अब उनकी सेवा और क्षमता का सम्मान यह होगा कि सरकार उनके भविष्य की मजबूत नींव तैयार करे। अग्निवीर प्रकोष्ठ तभी सार्थक होगा, जब वह भर्ती की तैयारी कर रहे युवा को अवसर, सेवा कर रहे अग्निवीर को सहयोग और सेवा पूरी कर चुके अग्निवीर को सम्मानजनक रोजगार का भरोसा दे सके। युवाओं के सपनों को सरकारी आदेशों से नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों से ताकत मिलेगी। अग्निवीर प्रकोष्ठ के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती भी है और अवसर भी।




