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कैमरों के सामने ‘बचत’ और पीछे ‘शाही ठाठ’

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  • देशभर में पीएम की अपील के बाद मची सादगी की होड़
  • माननीय व अफसरों का आमजन जैसा दिखने का नया दौर
  • सोशल मीडिया में समाज में अचानक उपज गई नई लहर
  • जनता पूछ रहीकृक्या यह असली बचत है या ‘फोटो सेशन’

देहरादून। वैश्विक आर्थिक संकट, बढ़ती महंगाई और अनिश्चितताओं के दौर में प्रधानमंत्री मोदी की सादगी और बचत संबंधी अपील के बाद देश की राजनीति में एक नया दृश्य देखने को मिल रहा है। जैसे ही टीवी पर प्रधानमंत्री ने वैश्विक संकट और मितव्ययिता का आह्वान किया तो सोशल मीडिया पर आर्थिक आपातकाल जैसे हालात हो गए है। माननीय से लेकर छोटे-बडे़ नेता और अधिकारियों को अपनी सादगी और मितव्ययिता का डिजिटल पर प्रदर्शन कर देश में एक अनोखा ट्रेड शुरू हो गया है।
अचानक कई माननीयों को सादगी पसंद आने लगी है, जो नेता कल तक बड़े काफिलों और आलीशान व्यवस्थाओं के बीच दिखाई देते थे, वह अब कैमरों के सामने आम आदमी की तरह नजर आने की कोशिश कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरों की बाढ़ आ गई है। ऐसा लगने लगा है मानो देश में अचानक सादगी की प्रतियोगिता शुरू हो गई हो। हालांकि जनता भी अब राजनीति की इस पटकथा को समझने लगी है। लोग पूछ रहे हैं कि यदि सादगी सच में अपनानी है, तो क्या केवल कैमरों के सामने क्यों! क्या सरकारी फिजूलखर्ची, बड़े-बड़े काफिले, वीआईपी संस्कृति पर भी उतनी ही गंभीरता दिखाई जाएगी?
प्रधानमंत्री मोदी की अपील के बाद देशभर में नेताओं-अधिकारियों की जीवनशैली में अचानक बदलाव दिखाई देने लगा है। हर कोई पैदल आफिस जाने और अपना काफिला कम करने की फोटो मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर पोस्ट करवा रहा है। भाई पीएम की अपील है और उस पर अमल न हो यह तो हो ही नहीं सकता है। क्योंकि यह तो स्टेसस का सवाल जो है।
अकेले उत्तराखंड की बात करें तो यहां तो प्रिंट मीडिया में सायं को जब खबरों का पोस्टमार्टम होता है उस समय माननीय और अधिकारियों की सिफारिशें कि फला-फला… और संपादक जी से लेकर यूनिट हैड तक की सिफारिश आ रही है। यही नहीं सोशल मीडिया के सभी प्लेफार्मों पर तस्वीरों के साथ कई वीडियों माननीय और अफसरों की तैर रही है। आमजन यह देखकर हैरान है कि आखिर एकदम से ऐसा कैसे हो गया। जबकि आमजन तो सदियों से सादगी से जी रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी की राजनीति में जनसंपर्क और प्रतीकात्मक संदेशों की हमेशा बड़ी भूमिका रही है। स्वच्छता अभियान में झाड़ू लगाना हो या सैनिकों के बीच त्योहार मनानाकृइन संदेशों ने आम जनता पर प्रभाव डाला। अब उसी शैली को दूसरे जनप्रतिनिधि भी अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। अधिकारियों के लिए तो यह मजबूरी बन जाती है। आमजन की इस पर मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कुछ लोग नेताओं अधिकारियों के इस बदले व्यवहार को सकारात्मक मान रहे हैं, जबकि कई लोगों का कहना है कि दिखावा है और कुछ नहीं।

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