देहरादून। राजधानी देहरादून में नालोे—खालों पर लगातार हो रहे अतिक्रमण को लेकर नगर निगम की भूमिका पर सवाल उठने लगे है। ताजा मामला कालीदास रोड स्थित नाले पर की गयी कब्जेदारी को लेकर सामने आया है। हालांकि नगर निगम प्रशासन ने क्षेत्रीय पार्षद की उच्च स्तरीय शिकायत के बाद इस नाले पर किये गये अतिक्रमण को हटा दिया गया है। वहीं स्थानीय लोगों का कहना है कि जब यह अतिक्रमण किया जा रहा था तो नगर निगम प्रशासन शिकायत के बाद भी गहन निद्रा में सोया पड़ा था।
आरोप है कि बिल्डर ने विभागों को गुमराह कर खनन अनुमति हासिल की। और निकाली गयी मिट्टी को प्लाट के पीछे स्थित नाले में डाल दिया गया जो बिन्दाल नदी से जुड़ा है। बताया जा रहा है कि नाला पाट देने के बाद वहंा निर्माण गतिविधियंा शुरू कर दी गयी।
मामले की गम्भीता को देखते हुए क्षेत्रीय पार्षद मोहन बहुगुणा द्वारा इस मामले को लेकर जहंा नगर निगम में इसकी शिकायत की गयी, जहंा कोई कार्यवाही न होता देख उन्होने मामले से जिलाधिकारी कार्यालय को अवगत कराया गया। जिसके बाद त्वरित कार्यवाही करते हुए नगर निगम प्रशासन द्वारा उक्त अतिक्रमण को खाली करा दिया गया है। सवाल यह है कि अगर स्थानीय लोग व क्षेत्रीय पार्षद मोहन बहुगुणा इस मामले को लेकर सजग न होते तो नगर निगम की नाक के नीचे शहर के बीचोबीच यह अतिक्रमण हो जाता।
सूत्रों का कहना है कि इस बिल्डर्स का पहले भी विवादों से नाता रहा है ओर इसको नगर निगम प्रशासन ही नहीं जिला व पुलिस प्रशासन भी अच्छे तरीके से जानते व पहचानते हैं। कई प्रार्थना पत्र इसके खिलाफ जिला प्रशासन व पुलिस प्रशासन की टोकरियाें में धूल फांकते देखे जा सकते हैंं।
बता दें कि उत्तराखण्ड हाईकोर्ट द्वारा 24 मार्च 2025 को राज्य सरकार को निर्देश दिये गये थे कि रिस्पना व बिन्दाल नदी तथा उससे जुड़े नाले खालों पर अतिक्रमण नहीं किया जायेगा तथा ऐसा करने वालो पर मुकदमा दर्ज कर कार्यवाही की जाये। लेकिन लगता है कि देहरादून नगर निगम प्रशासन उन आदेशों की अवेहलना कर रहा है। क्योंकि जब अतिक्रमण होता है तो शिकायत के बावजूद वहंा कोई कार्यवाही समय पर नहीं की जाती है। यही बात अतिक्रमण के मामलों में नगर निगम की भूमिका को संदिग्ध बनाता है।




