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कठिन दौर की शुरुआत

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बीते एक दशक से देश की राजनीति में क्या कुछ हो रहा है? भले ही आम आदमी के समय से परे रहा हो लेकिन अब उसकी समझ में सब कुछ आने लगा है। देश के राजनीतिक दल और नेता चुनावी नतीजों में उलझे हैं वहीं दूसरी ओर देश में महंगाई और बेरोजगारी की समस्या दस्तक दे रही है यह समस्या कितनी अधिक गंभीर और भ्ौयावह रूप ले चुकी है इसका अभी किसी को भी अनुमान नहीं है। किसी राष्ट्र के लिए एनर्जी की क्या महत्त्ता है? यह बात किसी के भी तब तक समझ नहीं आ सकती है जब तक स्थिति सामान्य हो। असामान्य होते ही हालात ने देश में यह एनर्जी संकट इतना गंभीर होने वाला है कि इसके प्रभाव से क्या आम और क्या खास कोई भी व्यक्ति बच नहीं सकता है। तेल और गैस की कीमतों में होने वाली इस असामान्य मूल्य वृद्धि से उघोग धंधों का चौपट होना और इन औघोगिक इकाइयों में काम ठप होने से लोगों की नौकरियां जाने से लेकर होटल—रेस्टोरेंट और पर्यटन से जुड़े व्यवसाययों पर इसका अत्यंत ही प्रतिकूल प्रभाव पड़ना शुरू हो गया है। चाय से लेकर भोजन की थाली तक की कीमतों में 20 से 30 फीसदी तक का इजाफा हो चुका है। तथा अभी इसमें और अधिक वृद्धि के आसार दिखाई दे रहे हैं क्योंकि अभी सिर्फ खाना पकाना ही महंगा हुआ है पेट्रोल और डीजल की कीमतों में होने वाली वृद्धि से अब सामान की ढुलाई और यात्री किराए में भारी बढ़ोतरी होने तक तय है। चुनाव के कारण अब तक सरकार ने पेट्रोल डीजल की कीमतों में वृद्धि को रोका हुआ था। लेकिन चुनाव के नतीजे आते ही अब पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 25 से 35 रूपये प्रति लीटर तक वृद्धि संभावित है जिसके कारण आम उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में भी भारी उछाल आएगा। पहले से महंगाई व बेरोजगारी की मार झेल रहे आम आदमी के लिए यह स्थिति असहनीय होने तक जा सकती है। देश में बड़ी संख्या में गरीबों की रेखा से नीचे जीने वाले और भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या में 80 से 90 लाख लोग बढ़ सकते हैं। खास बात यह है कि बीते 11 सालों से देश की सत्ता पर काबिज भाजपा की सरकार और नेताओं द्वारा देश के लोगों से देश की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को लगातार छुपाया जा रहा है। सरकारी आंकड़ों में भले ही सब कुछ हरा ही हरा क्यों ना दिख रहा हो लेकिन आंतरिक हालात बेहद ही खराब होते जा रहे हैं। रुपए की कीमत अगर डॉलर के मुकाबले शुन्य पर जाने जैसी स्थिति हो तो आपको आयात की निर्भरता बहुत ही अल्पकाल में दिवालिया बना सकती है। मगर बीते 10 सालों में भाजपा के नेताओं ने इस तरफ कतई भी ध्यान नहीं दिया उनके लिए राजनीति का अर्थ सिर्फ और सिर्फ चुनाव लड़ने और चुनाव कैसे जीतना है तक ही सीमित रहा है। उनके लिए राजनीति का अर्थ राष्ट्र नीति कभी नहीं रहा है जहां समाज के कल्याण के लिए योजनाएं और नेीतियों का निर्माण किया जाता है। बीते एक दशक से भाजपा ने सिर्फ अपनी चुनावी जीत सुनिश्चित करने वाली नीतियों को ही प्राथमिकता दी है। जिसका खामियाजा अब पूरे देश को भोगना पड़ रहा है।

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