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सिस्टम का स्याह सच जीतू मुंडा

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जब देश का मुख्य मीडिया पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे से पहले एग्जिट पोल के जरिए भाजपा की जीत का डंका पीटने और नेता तथा समीक्षक उसका पोस्टमार्टम करने में जुटे हैं तथा पीएम मोदी सिक्किम में फुटबॉल के मैदान पर गोल पर गोल दाग कर अपनी हौसला बुलंदी का इजहार कर रहे हैं। ऐसे में उड़ीसा से आई एक अत्यंत ही हृदय विधायक तस्वीर ने जनमानस को झकझोर कर रख दिया। आजादी के अमृत काल में आई यह तस्वीर डबल इंजन सरकारों और सरकारी सिस्टम के उस स्याह सच को बेनकाब करती है जिस पर किसी का भी सर शर्म से झुक जाए। उड़ीसा के क्योझार जिले का रहने वाला एक व्यक्ति जिसका नाम जीतू मुंडा है, अति निर्धन इस आदिवासी के कंधे पर उसकी बहन का कंकाल है जो तीन माह पूर्व मर चुकी है जिसे वह 3 किलोमीटर पैदल चलकर बैंक तक ले जाता है और कहता है कि अब इससे हस्ताक्षर करा लो और मुझे खाते में जमा उसके 19,300 रूपये दे दो। उसका जब सोशल मीडिया पर यह वीडियो वायरल होता है तो सरकार और सिस्टम ही नहीं देश का पूरा समाज हिल जाता है। सत्ता में बैठे हुए लोग जो समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के उत्थान का दावा करते है उनके मुंह पर जीतू मुंडा की यह तस्वीर एक करारा थप्पड़ ही नहीं है बल्कि उस समाज की कड़वी सच्चाई है जिन्हें आजादी के 80 साल बाद भी नंगे बदन भूखे पेट रहने पर मजबूर कर रखा है। खास बात यह है कि यह तस्वीर राष्ट्रपति द्रोपति मुर्मू के गृह राज्य के एक आदिवासी क्षेत्र से आई है। जिन्हें वर्तमान सरकार द्वारा राष्ट्रपति पद पर बैठाकर आदिवासियों की परम हितेषी और महिला सशक्तिकरण की एक मिसाल बनाकर पेश किया गया था। अनपढ़ और गरीब एक आदिवासी के लिए एक मृत्यु प्रमाण पत्र या जन्म प्रमाण पत्र बना पाना आज भी क्या आसान काम है? प्रमाण पत्र हासिल करने से ज्यादा सुगम रास्ता जीतू मुंडा को यही लगा की कब्र से खोदकर अपनी बहन का कंकाल ही बैंक कर्मियों को दिखा दे जिससे बैंक में जमा उसके पैसे उसे मिल जाए जो उसकी जीवन रेखा है। उड़ीसा के मुख्यमंत्री मोहन मांझी ने इस तस्वीर को देखकर डीएम को फोन खटखटाना पड़ा तब जाकर हरकत में आया सिस्टम तथा रेड क्रॉस जैसी संस्था। अब लोग सरकार से सवाल पूछ रहे हैं क्या भाजपा ने ऐसे ही अच्छे दिन लाने का वायदा किया था? सरकार और सिस्टम की संवेदनहीनता का इससे बड़ा और क्या उदाहरण हो सकता है? अभी बंगाल के चुनाव में पीएम मोदी लोगों को समझा रहे थे की डबल इंजन सरकार बनाओ और विकास पाओ। उड़ीसा में तो डबल इंजन सरकार है फिर यहां से जीतू मुंडा की ऐसी तस्वीर क्यों सामने आई? इस सवाल को सरकार से पूछने की हिम्मत क्या कोई कर सकता है? ऐसे हालात सिर्फ उड़ीसा के ही नहीं है पूरे देश के हैं। उत्तराखंड में भले ही सरकार कुपोषण मिटाने के नाम पर 430 करोड़ एक साल में खर्च करती है लेकिन राज्य के 25 फीसदी बच्चे 56 फीसदी महिलाएं कुपोषण का शिकार हैं। अभी कुछ समय पूर्व राज्य के एक गांव से पूरे परिवार के कुपोषित होने तथा मरणासन्न स्थिति में पहुंचने का मामला प्रकाश में आया था तब शासन प्रशासन हरकत में आया था। भले ही सरकार अपनी पीठ थपथपाती रहे लेकिन धरातल पर सच्चाई इससे अलग है। केंद्र सरकार 5 ट्रिलियन वाली अर्थव्यवस्था का डंका पीट रही है। अंबानी परिवार एक शादी पर 200 करोड़ फूंक देता है 75 करोड़ खर्च कर विदेशी कलाकारों को बुला सकता है। उघोगपति अरबो खरबो का कर्ज लेकर विदेश भाग सकते हैं। तथा करोड़ का कर्ज माफ हो सकता है वही जीतू मुंडा जैसे लोगों को उनका जमा किया 19300 रूपये भी बैंक से निकालने के लिए अपनी बहन की कब्र खोदकर कंकाल कंधे पर ढोना पड़ता है यह विडंबना नहीं तो क्या है यहां अंधभक्त कोरोना भागने को ताली बजा सकते हैं नेता चुनाव जीतने की गारंटी दे सकते हैं अगर कुछ नहीं हो सकता है तो वह है गरीबों का उद्धार, जो 80 साल में भी नहीं हो सका है।

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