Home संपादकीय लोकायुक्त से डर क्यों?

लोकायुक्त से डर क्यों?

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उत्तराखंड सरकार में मुख्य सेवक पद पर आसीन पुष्कर सिंह धामी जिस कार्यक्रम में भी जाते हैं वह अपने कार्यकाल में किए गए तमाम उन ऐतिहासिक कामों की सूची अवश्य पेश करते हैं जो अभी तक उनके द्वारा किए गए हैं। कल भी जब राजधानी दून में एक सम्मान समारोह आयोजित किया जा रहा था तो उन्होंने अपने कार्यकाल में की गई एकमात्र इन्वेस्टर्स समिट की तमाम उपलब्धियों से लेकर योजनाओं में हुई ग्राउंडिंग तथा पूरा विवरण पेश किया गया। यही नहीं यूसीसी लागू करने वाला देश का पहला राज्य होने से लेकर धर्मांतरण विरोधी कानून और दंगा रोधी तथा नकल रोधी कानून तक और मदरसा बोर्ड खत्म करने की बात कहते हुए दावा किया गया कि वह लगातार पूरी प्रदेश को बेहतरीन तथा उसे अव्वल राज्य बनाने के लिए दिन—रात काम कर रहे हैं। वैसे भी मुख्य सेवक के रूप में सबसे लंबी राजनीतिक पारी वाले पुष्कर सिंह धामी के नाम अनेक रिकार्ड जुड़ने जा रहे हैं। लेकिन खास बात यह है कि वह सिर्फ उन्हीं कामो को गिनाते हैं जिन्हे गिनाना चाहते हैं। भाजपा 2027 के शुरू होते ही अपने दूसरे कार्यकाल को पूरा करने जा रही है। लेकिन सत्ता में आने पर 100 दिन में लोकायुक्त की नियुक्ति करने और भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का दावा करने वाले मुख्य सेवक अब तक एक अद्द लोकायुक्त की भी नियुक्ति क्यों नहीं कर सके हैं? इस बारे में वह कभी कोई चर्चा तक भी क्यों नहीं करते? हो सकता है उनकी नजर में भी पूर्ववर्ती सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत की तरह सूबे में अब भ्रष्टाचार नहीं रहने के कारण लोकायुक्त की नियुक्ति की जरूरत ही नहीं रह गई हो। अन्ना हजारे के अनशन के बाद उत्तराखंड ही वह पहला राज्य बना था जिसने लोकायुक्त का गठन करने का गौरव हासिल किया था। यह सवाल बीते दिनों यूपी एसएससी की परीक्षा तक में पूछा जा चुका है लेकिन मुख्यमंत्री भाजपा सरकार की उपलब्धियों में इसे जोड़ना शायद इसलिए भूल जाते हैं क्योंकि यह तत्कालीन मुख्यमंत्री मेजर जनरल (से.नि.)बीसी खंडूरी द्वारा किया गया था। आप सोच रहे होंगे कि हम आज इसका जिक्र क्यों कर रहे हैं? दरअसल केंद्रीय मंत्रालय से उत्तराखंड शासन को भ्रष्टाचार के एक मामले की जांच लोकायुक्त से कराने के लिए चिट्ठी लिखी गई है। लेकिन यहां 12—13 साल से लोकायुक्त की कुर्सी खाली पड़ी है और भाजपा सरकार 3000 से अधिक दिनों में एक अद्द लोकायुक्त की नियुक्ति तक नहीं कर सकी है जबकि नैनीताल हाईकोर्ट सरकार को कई बार खटखटा चुका है। यही नहीं इस लोकायुक्त में नियुक्त लगभग 40 कर्मचारियों के वेतन भत्ते तक पर रोक लगाने को कह चुका है। लगता है पूर्व सीएम त्रिवेंद्र ठीक ही कहते थे कि राज्य में जब भ्रष्टाचार ही नहीं तो फिर लोकायुक्त की क्या जरूरत है। 100 दिन में लोकायुक्त लाने वाले त्रिवेंद्र तो चले गए लेकिन मुख्य सेवक भी शायद यही माने बैठे हैं। जबकि यह सही नहीं है अगर भ्रष्टाचार खत्म हो चुका है तो सीबीआई जो वर्तमान में राज्य के तीन मामलों की जांच कर रही है वह नहीं कर रही होती। लोकायुक्त कार्यालय पर 3 करोड़ सालाना खर्च क्यों किया जा रहा है सरकार को चाहिए कि इस लोकायुक्त के कार्यालय को ही बंद कर दे, कम से कम इस पर जो जनता की कमाई का रुपया खर्च हो रहा है वह तो बच सकेगा। या फिर सिर्फ कागजों में ही उपलब्धियों और अव्वल होने का दावा काफी नहीं है उसके लिए कार्यालय भी जरूरी है।

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