Home News Posts उत्तराखंड ‘डॉक्टरों का नया मिशन- मरीजों को ढूँढना, इलाज बाद में’

‘डॉक्टरों का नया मिशन- मरीजों को ढूँढना, इलाज बाद में’

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  • उत्तराखंड स्वास्थ्य महकमें की असली तस्वीर

देहरादून। भले ही उत्तराखंड की सरकार और स्वास्थ्य मंत्री धन सिंह रावत द्वारा राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार का ढिंढोरा पीट कर आए दिन अपनी पीठ थपथपाई जा रही हो लेकिन पहाड़ पर स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली की तस्वीरें उनके दावों की कलई खोलती दिखती हैं। टिहरी के भिलंगना ब्लॉक में 18 नवंबर को 24 साल की गर्भवती नीतू की इलाज के अभाव में हुई मौत इसका ताजा उदाहरण है।
राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की हकीकत बयां करने वाली यह अकेली घटना नहीं है। 22 साल की रवीना, 23 साल की अनीशा और 24 साल की नीतू सिर्फ नाम मात्र नहीं है। इन प्रसुताओं को इलाज के अभाव में सिर्फ अपनी ही जान नहीं गंवानी पड़ी है बल्कि अपनी कोख में पलने वाले बच्चों की जान भी गंवानी पड़ी है। कोई भी परिवार जब किसी नवागान्तुक मेहमान के घर आने की खुशियों के सपने संजो रहा हो और उसके साथ इस तरह की घटना पेश आ जाए कि जहां उसका सब कुछ समाप्त हो जाए, इस दर्द को न कोई सरकार महसूस कर सकती है न ही कोई डॉक्टर। सिर्फ वह परिवार ही इस दर्द को महसूस कर सकता है जिसने ऐसी स्थिति में अपनों को खोया हो।
उत्तराखंड के स्वास्थ्य मंत्री धन सिंह रावत ने अभी बीते दिनों अपने एक बयान में कहा था कि अब उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाएं इतनी बेहतर हो चुकी है कि पहले मरीज डॉक्टरों को ढूंढते थे और अब डॉक्टर मरीजों को ढूंढने में लगे हुए हैं। अगर राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं इतनी ही बेहतर हो चुकी है तो उन्हें इस बात को बताना चाहिए कि राज्य में कितने विशेषज्ञ डॉक्टरों की जरूरत है और उनके कितने पद खाली पड़े हैं। सच यह है कि राज्य में अभी तक सिर्फ 30—31 सामान्य डॉक्टरों की ही भर्ती हो पाई है। तथा 288 डॉक्टरों की भर्ती प्रक्रिया अभी भी जारी है और विशेषज्ञ डॉक्टरों के खाली पदों के सापेक्ष अभी 45 फीसदी ही पद भरे जा सके हैं। और 50 फीसदी से अधिक पद खाली पड़े हैं। रही डॉक्टरों को पहाड़ पर चढ़ाने की बात तो नीतू को अगर सही समय पर इलाज मिल पाता तो उसकी जान शायद नहीं जाती और वह बालेश्वर अस्पताल से हायर सेंटर पहुंचने के रास्ते में ही दम नहीं तोड़ देती।
पहाड़ पर स्वास्थ्य सेवाओं की बात तो छोड़िए क्योंकि यहां से आए दिन डंडी—कंंडी पर कंधों पर मरीजों को दुर्गम रास्तों पर ढोते लोग और इलाज के अभाव में उनके मरने की खबरें तो आए दिन आती ही रहती है, अगर दून की बात करें तो बीते तीन—चार महीनों में 81 जच्चा—बच्चों की मौत के मामले सामने आ चुके हैं जिसमें 18 महिलाएं और 63 बच्चे शामिल हैं। सरकार और स्वास्थ्य विभाग अब इनकी जांच करने की बात कह रहा है। जांच का क्या नतीजा होगा पता नहीं लेकिन राज्य के स्वास्थ्य विभाग की यह तस्वीर स्वास्थ्य सेवाओं की हकीकत बयां करने के लिए काफी है।

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