सोने के लगातार बढ़ते दामों से आम आदमी तो हैरान है ही इसे लेकर अर्थशास्त्री भी परेशान है। आम आदमी यह सोचकर दुखी और परेशान है क्योंकि शादी विवाह और अन्य तमाम सामाजिक रीति रिवाज को निभाने मेंं सोने की हमेशा जरूरत होती है और अब सोना आम आदमी की पहुंच से इतना बाहर होता दिख रहा है कि वह जरूरी मौको पर सोना नहीं खरीद रहा है। लेकिन अर्थशास्त्री अब यह सोचने पर विवश है कि अगर सोने की कीमतों में यह तेजी जो लगातार जारी है अगर ऐसी ही बनी रही तो यह विश्व की अर्थव्यवस्थाओं में बड़े बदलाव की आहट तो नहीं है, जहां किसी भी देश की मुद्रा पर से लोगों का भरोसा उठ जाता है। कहीं यह समय किसी ऐसे बदलाव की ओर तो नहीं जा रहा है जब सिर्फ सोना और चांदी जैसी धातुओं और द्रव्यों पर लोगों का भरोसा होगा बाकी डॉलर, येन, रुपया आदि—आदि सभी सिर्फ कागज के टुकड़े बंन कर रह जाएंगे। अर्थशास्त्र में मुद्रास्फीति का जो कॉन्सेप्ट होता है सोने की कीमतों में वर्तमान समय की जो वृद्धि है लागू नहीं होता है। 1 साल में सोने की कीमतों में 30 से 35 फीसदी की वृद्धि बाजार की अवधारणा को तोड़ती दिख रही है। विशेषज्ञों की सोच है कि सोने के भाव में यह वृद्धि थमने वाली नहीं है। सोने की कीमतों के लिए स्टैंडर्ड मुद्रा माने जाने वाले डॉलर की कीमत में अंतरराष्ट्रीय बाजार में आने वाली गिरावट सोने की कीमतें बढ़ाने का सबसे अहम कारण माना जा रहा है। सभी देशों द्वारा सोने को प्रतिभूति के रूप में मुद्रा कोष में रखे जाने के कारण सभी देशों के सेंट्रल बैंक सोने की खरीद करते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदलते हालात के मद्देनजर अब सभी देश अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए सोने की खरीद तो कर ही रहे हैं साथ ही विदेशों में जमा किए गए अपने सोने को भी अपने देश में वापस लाने में जुट गए हैं। अर्थ शास्त्रियों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर इन दिनों जो उथल—पुथल मची हुई है तथा महाशक्तियों के बीच जो वर्चस्व की जंग चल रही है वह कब किस देश में किस तरह के हालात पैदा कर दे इसका अनुमान लगा पाना मुश्किल कर दिया है। देश से लेकर आम आदमी तक की सोच यह हो चली है कि इस दौर में अगर भविष्य की सुरक्षा को कोई चीज सुनिश्चित कर सकती है तो वह सिर्फ सोना ही है। तथा बाजार तो हर दौर में अपने नियमों से चलता है सोने की मांग लगातार बढ़ रही है इसलिए सोने के दाम भी बढ़ते जा रहे हैं। अमेरिका के द्वारा जो ट्रेड वार खड़ा किया गया है उससे यूरोपीय देशों में जो हलचल पैदा हुई है वह अब डॉलर की सर्वमान्यता को चुनौती के स्तर पर समझा जा रहा है। यही कारण है कि अब गैस और तेल के सौदे भी डॉलर की जगह सोने में किये जा रहे हैं। कहा तो यहां तक जा रहा है कि मुद्राओं के निष्प्रभावी होने तथा फिर द्रव्य व वस्तुओं की खरीद फरोख्त वाले पुराने दौर के वापसी की ओर दुनिया लौट रही है। उस दौर में जब नोट और डॉलर की कोई मान्यता नहीं थी और वह एक कागज का टुकड़ा ही माना जाता था। उस समय भी सोना ही सोना था और आने वाले समय में भी सोना ही सोना रहना है। इसी सोच के कारण जिधर देखो उधर अपनी—अपनी क्रय क्षमताओं के अनुसार सोना समेटने की कोशिशें की जा रही है तथा सोना उछाल मार रहा है जिसकी कीमत अब सवा लाख तोला तक पहुंचने वाली है कहां जाकर रुकेगा इसके बारे में कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।




