September 11, 2026ब्रिक्स का बढ़ता दायरा अब केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रह गया है। वैश्विक राजनीति में बदलते शक्ति-संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति शृंखलाओं की अस्थिरता और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने इस समूह के सामने सहयोग के नए क्षेत्र खोल दिए हैं। ऐसे समय में रक्षा और ऊर्जा क्षेत्र पर बढ़ता जोर महज रणनीतिक जरूरत नहीं, बल्कि उभरती बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की स्पष्ट तस्वीर भी है। ब्रिक्स की मूल अवधारणा आर्थिक सहयोग और विकास से जुड़ी रही है, लेकिन दुनिया जिस दौर से गुजर रही है, उसमें आर्थिक सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच अंतर लगातार कम हो रहा है। ऊर्जा आपूर्ति बाधित होती है तो उद्योग प्रभावित होते हैं, महंगाई बढ़ती है और अर्थव्यवस्था पर दबाव आता है। इसी तरह महत्वपूर्ण तकनीक, रक्षा उपकरण और रणनीतिक संसाधनों के लिए कुछ सीमित देशों पर निर्भरता किसी भी राष्ट्र की सामरिक स्वायत्तता को कमजोर कर सकती है। यही वजह है कि ब्रिक्स देशों के बीच ऊर्जा सहयोग को नई प्राथमिकता मिलना स्वाभाविक है। तेल और गैस से आगे बढ़कर परमाणु ऊर्जा, नवीकरणीय ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, ऊर्जा भंडारण और महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में सहयोग आने वाले वर्षों में निर्णायक हो सकता है। दुनिया का ऊर्जा संक्रमण जितना तेज होगा, उतना ही महत्वपूर्ण यह सवाल होगा कि नई ऊर्जा अर्थव्यवस्था के संसाधनों और तकनीक पर नियंत्रण किसका होगा। भारत के लिए यहां अवसर भी है और चुनौती भी। भारत एक ओर तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और विशाल ऊर्जा जरूरतों वाला देश है, तो दूसरी ओर वह ऊर्जा सुरक्षा के लिए विविध स्रोतों पर निर्भरता बढ़ाना चाहता है। ब्रिक्स के मंच पर भारत को अपने हितों के अनुरूप ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश करनी चाहिए, जिसमें ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षित हो, कीमतों में अत्यधिक अस्थिरता कम हो और नई ऊर्जा तकनीकों तक विकासशील देशों की पहुंच बढ़े। रक्षा क्षेत्र में सहयोग का सवाल इससे भी अधिक संवेदनशील है। ब्रिक्स को यदि रक्षा सहयोग की दिशा में आगे बढ़ना है तो उसकी प्राथमिकता किसी सैन्य गुट के निर्माण की बजाय रक्षा तकनीक, आतंकवाद के खिलाफ सहयोग, साइबर सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और रक्षा उत्पादन में तकनीकी साझेदारी होनी चाहिए। ब्रिक्स को नाटो जैसी सैन्य संरचना में बदलने की कोशिश न तो व्यावहारिक होगी और न ही उसके मूल स्वरूप के अनुरूप। भारत के लिए रक्षा सहयोग का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष रणनीतिक स्वायत्तता है। भारत को किसी एक शक्ति-धु्रव पर निर्भर होने की बजाय अलग-अलग साझेदारियों के माध्यम से अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करना होगा। स्वदेशी रक्षा उत्पादन, महत्वपूर्ण रक्षा तकनीक, ड्रोन, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष आधारित प्रणालियों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्रों में सहयोग भविष्य की सुरक्षा का आधार बन सकता है। हालांकि यहां सावधानी भी जरूरी है। ब्रिक्स में शामिल देशों के सामरिक हित हमेशा एक जैसे नहीं हैं। कई मामलों में उनके बीच मतभेद भी हैं। इसलिए संगठन से ऐसे निर्णयों की अपेक्षा करना, जिन पर सभी देश समान दृष्टिकोण रखते हों, व्यावहारिक नहीं होगा। ब्रिक्स की ताकत उसकी विविधता में है और कमजोरी भी यही विविधता बन सकती है। इसलिए रक्षा और ऊर्जा सहयोग को किसी देश के खिलाफ मोर्चेबंदी के रूप में नहीं, बल्कि रणनीतिक आत्मनिर्भरता और वैश्विक दक्षिण की सामूहिक क्षमता बढ़ाने के माध्यम के रूप में देखा जाना चाहिए। ब्रिक्स का भविष्य इस बात से तय होगा कि वह घोषणाओं से आगे बढ़कर कितनी ठोस परियोजनाएं खड़ी कर पाता है। साझा ऊर्जा गलियारे, नई ऊर्जा निवेश, तकनीकी सहयोग, महत्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षित आपूर्ति और रक्षा तकनीक में साझेदारी यदि जमीन पर उतरती है तो ब्रिक्स वैश्विक व्यवस्था में एक प्रभावशाली आर्थिक-रणनीतिक मंच के रूप में उभर सकता है। दुनिया अब केवल तेल के कुओं और हथियारों से नहीं, बल्कि तकनीक, ऊर्जा स्रोतों, आपूर्ति श्रृंखलाओं और डेटा से भी शक्ति तय कर रही है। ऐसे में ब्रिक्स के लिए रक्षा और ऊर्जा पर फोकस समय की मांग है। भारत को इस बदलती व्यवस्था में अपनी भूमिका केवल भागीदार की नहीं, बल्कि दिशा तय करने वाले देश की बनानी होगी। यही उसकी रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक नेतृत्व, दोनों की कसौटी होगी।