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लोकतंत्र की जंग अंतिम मुकाम पर

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राहुल गांधी और विपक्ष के नेता जिस वोट चोरी के आरोपो को लेकर आंदोलन खड़ा कर चुके हैं उन आरोपों का जवाब अब तक न तो कोई भाजपा का नेता दे पाया है और न निर्वाचन आयोग। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने जब इस मुद्दे पर पत्रकार वार्ता की थी तो उन्होंने राहुल के आरोपों को गलत बताते हुए कहा था कि यदि 25 अगस्त तक वह है हल्फनामा नहीं देते हैं तो उन्हें देशवासियों से माफी मांगनी पड़ेगी। कल 25 अगस्त पीछे निकल चुका है राहुल ने तो न माफी मांगी न हलफनामा दिया क्या चुनाव आयोग राहुल के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करेगा? चुनाव आयोग में बैठे लोगों को भी अब यह आभास हो चुका है की हवा का रुख क्या है? राहुल गांधी और तेजस्वी यादव जो इन दिनों बिहार में वोट अधिकार यात्रा निकाल रहे हैं उसे यात्रा में उमड़ने वाली लाखों लोगों की भीड़ ने न सिर्फ बिहार में जहां नवंबर में चुनाव होना है बल्कि पूरे देश में इस संदेश का बहुत ही पुख्ता तरीके से जन—जन तक पहुंचा दिया है कि केंद्र में जो मोदी के नेतृत्व में तीसरी बार सरकार बनी है वह लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार नहीं है इस सरकार का गठन वोट चोरी के जरिए किया गया है। बिहार में बीते 10 दिनों से वोट चोर गाड़ी छोड़ के नारे गूंज रहे हैं। इससे पूर्व देश के 300 से अधिक सांसदों द्वारा लोकसभा से निर्वाचन आयोग तक जो विरोध मार्च किया गया था और अपनी गिरफ्तारियंा दी गई थी तथा पूरे विपक्ष ने एक स्वर में प्रधानमंत्री मोदी के लोकसभा सदन में पहुंचते ही वोट चोर गाड़ी छोड़ के जो नारे लगाए गए थे इन तमाम घटनाओं ने इस वोट चोरी के मामले या यूं कहे कि चुनावी धांधली के मुद्दे को आम आदमी तक पहुंचाने में जो सफलता हासिल की गई है उसका कोई भी जवाब सत्ता पक्ष के पास नहीं है। इस वोट चोरी में निर्वाचन आयोग की क्या भूमिका है तथा सरकार ने निर्वाचन आयुक्त के चयन में किस तरह अपनी मोनोपोली बनाई और कानून बदलकर इस तरह की व्यवस्था बनाई गई है कि निर्वाचन आयुक्तों के खिलाफ न्यायपालिका मेंं कोई केस दर्ज न किया जा सके। यह तमाम तथ्य किसी से छिपे नहीं है। अभी 2 दिन पूर्व बिहार के उप—मुख्यमंत्री का बिहार में भारी जनसभा में अपनी समस्याओं को लेकर पहुंचे लोगों को यह कहकर फटकारा गया कि हमें आपका वोट नहीं चाहिए हैरान करने वाला था। क्या आज का सच यही है कि लोकतंत्र अब सिर्फ नाम के लिए ही बचा है। सत्ता में रहने वाले नेताओं को जनता के वोट की कोई जरूरत नहीं रह गई है तथा व्यवस्था अब ऐसी बना दी गई है कि आम आदमी वोट किसी को भी दे सरकार भाजपा की ही बनेगी। अगर ऐसा नहीं है तो गृहमंत्री अमित शाह किस आधार पर देश में आगामी 20 सालों तक भाजपा की ही सरकार रहने का दावा कर रहे हैं निश्चित तौर से संविधान बदलने तथा 30 दिन से अधिक जेल में रहने वाले नेताओं के मंत्री पद जाने का कानून लाने वाली सरकार की मश्ंाा और मंसूबे अब किसी से भी छिपे नहीं है यही कारण है कि विपक्ष भी अब संविधान और लोकतंत्र बचाओ की इस लड़ाई को अपनी अंतिम लड़ाई मानकर ही लड़ रहा है देश के मतदाताओं को अब यह फैसला करना है कि वह किसके साथ खड़े होते हैं। लोकतंत्र और संविधान बचाने की यह जंग तय करेंगी कि जीत उस तानाशाही की होती है जिसे चुनाव से हासिल किया गया है या फिर उस लोकतंत्र की जो देश के नागरिकों के वोट अधिकार से तय होती है।

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