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राजनीति का संक्रमण काल

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किसने सोचा होगा कि आजादी के अमृत काल में जब देशवासी स्वतंत्रता की 78वीं वर्षगांठ के महोत्सव मना रहे होंगे देश एक ऐसे राजनीतिक संक्रमण काल से गुजर रहा होगा जब देश में वोट चोर सत्ता छोड़ के नारे गूंज रहे होंगे। ऐसा लग रहा है मानो देश में फिर से ब्रिटिश शासन काल लौट आया हो और अंग्रेजी हुकूमत से निजात पाने के लिए लोग अंग्रेजों से भारत छोड़ो के के नारे लगा रहे होंगे? क्या देश की वर्तमान हुकूमत ने देश के लोगों से उनकी आजादी छीन ली है और उनके पास अब वह संवैधानिक अधिकार नहीं दिए गए हैं जिनका उल्लेख देश के संविधान में किया गया है? इसकी पड़ताल किया जाना वर्तमान हालत में जरूरी हो गया है। बीते कुछ समय से देश की सत्ता के गलियारों में आने वाली आवाजों को इसके लिए सुना जाना और समझा जाना जरूरी है। पिछले लोकसभा चुनाव से पूर्व आप ने कांग्रेस मुक्त भारत बनाने और संविधान बदलने से लेकर विपक्ष को दर्शक दीघा में बैठाने तथा मोदी है तो मुमकिन है जैसे तमाम बातें भी सुनी होगी और विपक्ष नेताओं द्वारा चौकीदार चोर है नारे भी सुने होंगे जो अब वोट चोर सत्ता छोड़ तक पहुंच चुके हैं। यह सब कुछ एक साल में नहीं हुआ है। यह बड़ा बदलाव बीते 10 सालों में आया है और अब इसकी कड़ियां जुड़ना शुरू हो गई है। विपक्ष की जिन बातों को लेकर देश के लोग हंसा करते थे उन्हें अब लगने लगा है कि विपक्ष बेवजह शोर शराबा नहीं कर रहा था लेकिन अब विपक्ष प्रभावी सबूतों के आधार पर यह साबित करता दिख रहा है कि देश का निर्वाचन आयोग लोकतंत्र के लिए सत्ता के लिए काम कर रहा है तथा देश की सर्वाेच्च जांच एजेंसियां सत्ता की कठपुतली बन चुकी है और सत्ता के विरोध में आवाज उठाने वालों और खिलाफ सवाल पूछने वालों को जांच के नाम पर सालों साल के लिए जेल में ठूंसा जा रहा है तब कहीं जाकर समझ में आ रहा है कि आखिरकार यह सब हो क्यों रहा है। सत्ता में बैठे लोगों द्वारा सत्ता पर एकाधिकार बनाए रखने के लिए जब देश में ऐसी व्यवस्था बना दी गई कि चुनाव और वोट किसी की भी कोई अहमियत नहीं रह गयी है तब इस अति का भंडा फूटना ही था। नेता विपक्ष राहुल गांधी ने अभी इस वोट चोरी को लेकर जो बड़ा खुलासा किया है और इस बम को फोड़ने जैसे शब्दों के साथ किया तो किसी को भी यह भरोसा नहीं हो रहा था कि वह जो बम फोड़ने की बात कह रहे हैं उसकी गूंज देश ही नहीं विश्व राष्ट्रो तक पहुंचेगी। भले ही देश के मीडिया में देश के 300 सांसदों के निर्वाचन आयोग कूच और उनकी गिरफ्तारी की खबर हैडलाइन न बन पाई हो लेकिन विदेशी मीडिया के प्रतिष्ठा अखबारों की हेडलाइन जरूर बन गई। राहुल गांधी द्वारा अभी यह कहा जा रहा है कि यह तो अभी ट्रेलर है पूरी पिक्चर तो अभी बाकी है। उनकी इस घोषणा को सत्ता में बैठे लोग हल्के में ले रहे हैं न तो आम आदमी। इस वोट चोरी के साक्ष्य पर देश की सर्वाेच्च अदालत भी सच साबित होने की ओर कदम बढ़ाने जा चुकी है। बिहार में मतदाता सूचियों मेंं विशेष कर पुननिरीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश ने ही चुनाव आयोग और सत्ता की नींव हिला दी है। सभी जान चुके हैं कि यही आंधी आने वाले समय में तूफान बनने वाली है अहम सवाल अब यह है कि इसकी अंतिम परिणीति क्या रहने वाली है। यह इससे पूर्व भी आपातकाल जैसी स्थितियों से गुजर चुकी है और देश का लोकतंत्र और अधिक मजबूत होकर बाहर आने का सबूत दे चुका है। लेकिन इस बार यह संक्रमण काल उससे भी अधिक गंभीर है। जिससे बाहर निकलने में लंबा समय लग सकता है और इसकी कोई भी बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ सकती है लेकिन जीत संविधान और लोकतंत्र की ही होगी यह भरोसा हर एक भारतीय को है।

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