अपनी विश्वसनीयता और निष्पक्षता के कारण देश के निर्वाचन आयोग को लोकतंत्र में सबसे सशक्त माना जाता था और देश की जनता उस पर सुप्रीम कोर्ट की तरह भरोसा करती थी। अब उसकी नींव दरक चुकी है। सवाल यह नहीं है कि क्या निर्वाचन आयोग आसानी से दोबारा जनता का विश्वास जीत सकेगा? दुखद पहलू यह है कि अपनी उस छी छालेदरी के लिए जो वर्तमान समय में हो रही है उसके लिए कोई और नहीं निर्वाचन आयोग खुद ही जिम्मेदार है। यहां यह कहना भी गलत नहीं होगा कि केंद्र की वर्तमान सरकार की दासता को अगर चुनाव आयोग ने स्वीकार नहीं किया होता तो वह इस दुर्दशा से बच सकता था। जब यह निर्वाचन आयोग ऐसी संवैधानिक स्वायत्तता के अधिकारों से लैस है जहां कोई भी सरकार या संस्था अपनी बात मनवाने पर मजबूर नहीं कर सकता है तब निर्वाचन आयोग को सत्ता का पिट्ठू बनने की क्या जरूरत थी? नेता विपक्ष द्वारा अभी एक प्रेस वार्ता के जरिए जब वोट चोरी का सबूत के साथ खुलासा किया गया था तो क्यों उसने यह स्वीकार करने की कि अगर मतदाता सूचियाें में कुछ गड़बड़ी है तो उसे ठीक किया जाएगा, के बजाय उल्टे राहुल गांधी से ही शपथ पत्र मांगने की बात कहकर उन्हें डराने की कोशिश की गई तथा बिहार में एस आई आर के नाम पर किए जाने वाले ड्रामें जिसमें 65 लाख वोटरों से मताधिकार छीनने का काम क्यों किया गया और सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा गया कि वह न तो किसी को यह बतायेगा कि उसका नाम मतदाता सूची से क्यों काटा गया और न उनके नाम को सार्वजनिक करेगा? चुनाव आयोग क्या स्वयं को संविधान से भी ऊपर माने बैठा था कि वह आम आदमी से उसके वोट के संवैधानिक अधिकार को छीन लेगा और कोई कुछ नहीं कर पाएगा। देश की सर्वाेच्च अदालत ने एस आई आर पर हो रही सुनवाई के बीच ही आज जो अंतरिम आदेश दिया गया है उसने चुनाव आयोग को उसकी औकात बता दी है। अब उसे 65 लाख उन लोगों के नामों की सूची तो सार्वजनिक करनी ही पड़ेगी साथ ही उन्हें नाम काटे जाने का कारण भी बताना पड़ेगा। यही नहीं उसे इन 65 लाख लोगों में से जो जायज वाटर होंगे उन्हें सिर्फ आधार कार्ड के आधार पर फिर मतदाता सूची में शामिल करना भी पड़ेगा। निश्चित तौर पर अब इस धांधली की हर एक परत से पर्दा उठेगा और चुनाव आयोग की और अधिक किरकिरी होगी। क्योंकि अब यह मुद्दा बिहार की एस आई आर तक ही सीमित नहीं रह गया है वोट चोरी का यह मुद्दा 2024 में हुए लोकसभा चुनाव की वैधता तक जा पहुंचा है। और यह सार्वजनिक रूप से कहा जा रहा है कि पीएम मोदी खुद तो चोरी के वोट से चुनाव जीते ही उनकी सरकार भी चोरी के वोट से सत्ता में बैठी है। इसके अलावा आज सुप्रीम कोर्ट ने ढाई साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद पानीपत के एक गांव के सरपंच चुनाव में हुई धांधली के मामले में कोर्ट में ईवीएम मशीनें मंगवा कर कराई रिकॉउटिंंग में हारे हुए प्रत्याशी मोहित को 51 मतों से विजई घोषित कर दिया और जिस प्रत्याशी कुलदीप को सिस्टम ने जीता दिया था उसे चुनाव हरा दिया। ईवीएम की चुनावी धांधली के इस तरह पकड़े जाने पर अब चुनाव आयोग में बैठकर शेरो शायरी करने वाले आयुक्तों को कहीं डूब मरने की भी जगह नहीं मिल पाएगी। भाजपा के शासनकाल में हमनें चंडीगढ़ मेयर चुनाव मेंं पकड़ी गई धांधली और सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी को पहले भी सुन चुके हैं जिसमें इसे लोकतंत्र की हत्या करार दिया गया था। लेकिन अब चुनाव आयोग लोकतंत्र की हत्या की आरोपों में ऐसा फंस चुका है कि उसकी साख दांव पर लग गई है।




