August 27, 2026नेपाल में आई जल प्रलय ने एक बार फिर हिमालय की उस बेचौनी को सामने ला दिया है, जिसे हम अक्सर प्राकृतिक आपदा कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच निकलते हैं। नदियों का उफान, बाढ़, भूस्खलन और तबाही की तस्वीरें केवल नेपाल की त्रासदी नहीं हैं। हिमालय की पूरी पट्टीकृनेपाल से लेकर उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर तक एक ही भौगोलिक और पर्यावरणीय संकट से गुजर रही है। सवाल यह नहीं है कि इस बार पानी इतना ज्यादा क्यों आया। बड़ा सवाल यह है कि हमने पहाड़ों को पानी संभालने की क्षमता से वंचित क्यों कर दिया? नेपाल की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि मानसून की भारी बारिश का असर वहां तेजी से दिखाई देता है। पहाड़ों में ढलानों पर बढ़ता निर्माण, जंगलों का दबाव, नदी-तंत्र के साथ छेड़छाड़ और बदलता मौसम इस खतरे को और बढ़ा रहे हैं। जब पहाड़ बारिश का पानी सोख नहीं पाते तो वही पानी कुछ घंटों में विनाशकारी धारा बन जाता है। नदी अपना रास्ता नहीं बदलती, हम उसके रास्ते में निर्माण कर देते हैं और फिर बाढ़ आने पर प्रकृति को दोष देने लगते हैं। हिमालय को केवल पर्यटन और जलविद्युत की मशीन समझने की भूल अब भारी पड़ रही है। पहाड़ की अपनी एक पारिस्थितिकी है। यहां सड़क काटने से लेकर सुरंग बनाने तक और नदी किनारे बस्तियां बसाने से लेकर बड़े निर्माण प्रोजेक्ट खड़े करने तक हर गतिविधि का असर नीचे तक जाता है। विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास जो पहाड़ की क्षमता को समझे। यदि विकास का अर्थ पहाड़ की ढलानों को कमजोर करना, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को रोकना और जंगलों को कम करना है तो वह विकास नहीं, भविष्य की आपदा की पटकथा है। नेपाल की त्रासदी भारत के लिए भी सीधा संदेश है। उत्तराखंड में हर मानसून के दौरान भूस्खलन, सड़क धंसने, नदियों के उफान और बादल फटने की घटनाएं बढ़ती दिखाई देती हैं। चारधाम यात्रा मार्गों से लेकर सीमावर्ती क्षेत्रों तक पहाड़ की संवेदनशीलता सामने आती रहती है। इसके बावजूद हमारी विकास नीति में आपदा से पहले की तैयारी से ज्यादा जोर आपदा के बाद राहत और मुआवजे पर दिखाई देता है। हेलीकाप्टर भेजना, सड़क खोलना और राहत पैकेज घोषित करना जरूरी है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। जरूरत इस बात की है कि हिमालयी देशों के बीच आपदा प्रबंधन को लेकर साझा रणनीति बने। नेपाल और भारत की नदियां सीमाओं को नहीं मानतीं। एक देश में हुई भारी बारिश का असर दूसरे देश तक पहुंच सकता है। इसलिए नदी घाटियों को राजनीतिक सीमाओं के बजाय प्राकृतिक इकाई मानकर काम करने की जरूरत है। मौसम पूर्वानुमान, बाढ़ की चेतावनी, जलस्तर की सूचनाएं और आपदा संबंधी डेटा दोनों देशों के बीच समय पर साझा होना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पहाड़ की आवाज को विकास की बहस में जगह मिले। स्थानीय लोगों से पूछे बिना पहाड़ का भविष्य तय नहीं किया जा सकता। जिस व्यक्ति ने पीढ़ियों से उस भूगोल को देखा है, उसकी चेतावनी किसी फाइल में बैठे विशेषज्ञ की रिपोर्ट से कम महत्वपूर्ण नहीं हो सकती। स्थानीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का मेल ही हिमालय को सुरक्षित रखने का रास्ता दिखा सकता है। जलवायु परिवर्तन ने खतरे को और गंभीर बना दिया है। बारिश का स्वरूप बदल रहा है। लंबे समय तक सूखा और फिर अचानक अत्यधिक बारिश जैसी स्थितियां सामने आ रही हैं। ऐसे में पुराने आंकड़ों और पुराने आपदा मानचित्रों के आधार पर भविष्य की योजना बनाना पर्याप्त नहीं होगा। हमें बदलते मौसम के हिसाब से नए जोखिम मानचित्र बनाने होंगे। नेपाल की जल प्रलय को कुछ दिनों की खबर बनाकर भूल जाना आसान है। लेकिन हिमालय हमें बार-बार चेतावनी दे रहा है। सवाल यह है कि हम हर बार तबाही के बाद जागेंगे या तबाही से पहले अपनी नीतियां बदलेंगे? प्रकृति विकास की विरोधी नहीं है। प्रकृति केवल इतना चाहती है कि विकास उसकी सीमाओं को समझकर किया जाए। हिमालय को जीतने की कोशिश जितनी जल्दी बंद होगी, उतनी ही जल्दी उसे बचाने की शुरुआत होगी। नेपाल की त्रासदी को इसलिए केवल पड़ोसी देश की आपदा मानना भूल होगी। यह पूरे हिमालय की चेतावनी है पहाड़ को बचाइए, वरना पहाड़ की तबाही मैदानों तक पहुंचेगी।