Home उत्तराखंड देहरादून किस पर होगी केदार की कृपा?

किस पर होगी केदार की कृपा?

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केदार बाबा की कृपा किस पर बरसने वाली है इसका पता 23 नवंबर को मतगणना के बाद ही चलेगा लेकिन भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधे होने वाले इस मुकाबले में भाजपा ने आशा नौटियाल और कांग्रेस ने मनोज रावत को चुनावी मैदान में उतार कर यह तय कर दिया है कि मुकाबला अत्यंत ही कठिन और दिलचस्प होने वाला है। भले ही केदारनाथ विधानसभा सीट के उपचुनाव के नतीजे का सरकार पर कोई प्रभाव पड़ने वाला न सही और न कांग्रेस का कोई बाद नफा नुकसान होने वाला है लेकिन यह चुनावी नतीजे सूबे की राजनीति का भावी भविष्य जरूर तय करने वाले साबित होंगे। क्योंकि जीत की गारंटी की भाजपा वाली पार्टी इससे पहले हुए मंगलौर और बद्रीनाथ सीट के उपचुनाव हार चुकी है जो इस मायने में इतिहास है कि राज्य गठन के बाद सत्ताधारी दल कभी किसी उपचुनाव में नहीं हारा था। कांग्रेस जिसने सत्ता से बाहर होते हुए भी दोनों सीटों पर हुए उपचुनाव में जीत दर्ज कर जो इतिहास लिखा था वह इससे उत्साहित है और वह एक बार फिर केदारनाथ उपचुनाव में भी भाजपा को शिकस्त देने का पूरा मन बना चुकी है यही कारण है कि उसने अपने सबसे दमदार प्रत्याशी को चुनावी मैदान में उतारा है यही नहीं कांग्रेस इस चुनाव के लिए जमीनी स्तर पर भी लंबे समय से तैयारी करने में जुटी हुई है। दरअसल लोकसभा की उस फैजाबाद सीट पर हार के बाद जो अयोध्या में आती है विपक्ष ने भाजपा के धार्मिक राजनीति के एजेडें के खिलाफ जो नरेशन तैयार किया उसे बद्रीनाथ उप चुनाव में कांग्रेस की जीत से और अधिक बल मिला है यही कारण है कि वह केदारनाथ में जीत के साथ अब इस अवधारणा को और पुख्ता करना चाहती है कि भाजपा की धार्मिक राजनीति के गुब्बारे की वह हवा निकाल चुकी है। उधर भाजपा जो राज्य में लगातार दो सरकार बना कर तथा लोकसभा की सभी पांच सीटों को दो बार जीत कर सफलता के जिस रथ पर सवार थी दो उप चुनाव हारने के बाद अब किसी भी कीमत पर केदारनाथ हार कर कांग्रेस को हावी नहीं होने देना चाहती है। भाजपा के लिए इस सीट पर भी हार मतलब यही होगा कि उसके लिए आने वाले चुनाव में चाहे वह निकाय तथा पंचायतों के ही चुनाव क्यों न हो उसके लिए आसान रहने वाले नहीं है। यही नहीं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जो भाजपा के केंद्रीय स्टार प्रचारको में भी शामिल है तथा जिन्हें भाजपा ने चुनाव हारने के बाद भी सीएम की कुर्सी पर बैठाया था केदारनाथ का चुनाव उनकी भी प्रतिष्ठा का सवाल बना हुआ है अगर मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भटृ जिन्हें पार्टी अब सांसद बना चुकी है मिलकर केदारनाथ नहीं जिता सके तो उनके राजनीतिक हित भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते हैं। केदारनाथ की जीत इन दोनों नेताओं के लिए क्या मायने रखती है तथा इसके क्या असर होंगे इससे वह अच्छी तरह से वाकिफ है। नामांकन पत्र भरने की अंतिम तारीख से मात्र एक दिन पूर्व प्रत्याशियों की घोषणा भी यही बताती है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही इस चुनाव को लेकर कितने संजीदा है। परिणाम भले ही किसी के पक्ष में रहे लेकिन इस सीट पर मुकाबला इतना कांटे का होने वाला है कि हार जीत का अंतर भी मंगलोर विधानसभा सीट के तरह अत्यंत कम रह सकता है। किसी के लिए भी जरा चूक हार जीत का परिणाम बदल सकते हैं। देखना होगा कि इस मिशन में सिकंदर कौन सिद्ध होता है।

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