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नफरत व भय की राजनीति क्यों?

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इन दिनों उत्तराखंड राज्य में लव जिहाद, लैंड जिहाद तथा थूक जिहाद जैसे मुद्दे चर्चाओं के केंद्र में है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इन मुद्दों को लेकर खासे संजीदा दिखाई दे रहे है। उनके द्वारा अपने सभी वक्तव्यों में इनका अनिवार्य रूप से जिक्र तो किया ही जा रहा है साथ ही प्रदेश के डेमोग्राफिक चेंज को रोकने के लिए प्रतिबद्धता भी जाहिर की जा रही है। इन मुद्दों को लेकर पहाड़ में जिस तरह का जनाक्रोश देखा जा रहा है और स्थानीय लोग अन्य राज्यों के गैर हिंदुओं को राज्य से बाहर करने के लिए आंदोलन चला रहे हैं तथा गांव की सीमाओं पर उनके प्रवेश पर रोक लगाने के बोर्ड लगाए जा रहे हैं वह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि पहाड़ की शांत वादियों में अब नफरत का जहर तेजी से फैलता जा रहा है। लैंड जिहाद को रोकने के नाम पर धार्मिक संरचनाओं पर बुलडोजर चलाये जाने का काम भी जारी है। राज्य सरकार का कहना है कि इस तरह की गतिविधियों को कतई भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह सिर्फ सरकार का पक्ष है लेकिन दूसरा पक्ष विपक्ष का भी है जिसकी सोच है कि भाजपा के नेताओं द्वारा एक सोची—समझी राजनीतिक रणनीति के तहत इन तमाम मुद्दों को हवा देने का काम किया जा रहा है। समाज में नफरत और भय का माहौल इसलिए तैयार किया जा रहा है जिससे वोटो का ध्रुवीकरण हो सके। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का कहना है कि भाजपा के नेता केदारनाथ की संभावित हार से डरे हुए हैं। इसलिए जनता में भय और डर तथा नफरत का माहौल बना रहे हैं। उनका कहना है कि भाजपा कांग्रेस पर तुष्टिकरण की राजनीति करने का आरोप लगाती है लेकिन अब यह बात पूरा देश और प्रदेश जान चुका है कि भाजपा किस तरह जाति—धर्म के आधार पर लड़ाने का काम करती है और डराने का काम करती है। हमने लोकसभा चुनाव में देखा था जब कांग्रेस के बारे में इन्होंने खूब प्रचार किया कि कांग्रेस सत्ता में आई तो तुम्हारी एक भ्ौंस छीन लेगी तुम्हारे जेवर छीन लेगी, तुम्हारा आरक्षण छीन कर अधिक बच्चे पैदा करने वालों को दे देगी। सवाल यह है कि उत्तराखंड में आजकल जिन मुद्दों की चर्चा है वह कोई मुद्दे है ही नहीं या फिर वास्तव में इन मुद्दों के कारण प्रदेश का सामाजिक परिवेश प्रभावित हो रहा है। दूसरा सवाल यह है कि क्या इन मुद्दों के कारण प्रदेश में नफरत का माहौल तैयार हो रहा है। कई लोगों का मानना है कि अगर पहाड़ पर ऐसा कुछ भी हो रहा है चाहे वह खाघ पदार्थों में थूकने की बात हो या महिलाओं से छेड़छाड़ की यह सरकार और प्रशासन की ही एक बड़ी विफलता है। हरीश रावत का साफ कहना है कि ऐसा कोई अपराधिक काम करने वाला व्यक्ति चाहे वह किसी भी धर्म संप्रदाय का हो उसके खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्यवाही होनी चाहिए। अपराधियों में पुलिस—प्रशासन का अगर कोई खौफ रहा होता तो इस तरह की वारदातें नहीं हो सकती थी। चुनावी जीत और हार से ज्यादा जरूरी है प्रदेश में सांप्रदायिक सद्भाव और आपसी भाईचारे की भावना का बना रहना। कोई राजनीतिक दल या नेता छद्म मुद्दों और समाज में डर का माहौल पैदा कर चुनाव भले ही जीत सकता हो उससे समाज और देश या प्रदेश का कुछ भी भला नहीं हो सकता है यह एक अटल सत्य है।

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