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पहाड़ी शहर बनेंगे ‘स्मार्ट’

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  • चुनावी साल में प्रदेश सरकार ने खेला मूलभूत सुविधाओं के लिए मास्टर स्ट्रोक
  • पहाड़ी जनपदों में स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार सहित अन्य समस्याओं का अंबार
  • पहाड़ी शहरों को स्मार्ट बनाने से रोजगार व पर्यटन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद

देहरादून। सूबे के पहाड़ी क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं के लिए आमजन प्रतिदिन सड़क पर उतरकर मांग कर रहे हैं और उनकी आवाज सरकार के कानों तक नहीं पहुंच रही है। राज्य बने इतना लंबा समय हो गया और आज भी पहाड़ के लोग खुद को ठगा ही महसूस कर रहे हैं। क्योंकि जिस मूल धारणा को लेकर राज्य का गठन किया गया था वह आज भी अधूरा है। ऐसे में प्रदेश सरकार प्रदेश के पहाड़ी शहरों को स्मार्ट बनाने की योजना बनाकर चुनावी साल में मतदाताओं को अपनी ओर खींचने के लिए दाव खेला है।
बता दें कि प्रदेश को बने दो दशक से भी अधिक का समय हो गया है और सूबे के खासकर पहाड़ी जिलों में विकास की किरण के नाम पर सिर्फ योजनाएं ही बनी हैं धरातल पर आज दिन तक कुछ नहीं दिखा। चुनाव आते ही नेता अपने पुराने वायदों को भूलकर नई योजना का शिगूफा फेंककर आमजन को यह दर्शाने की कोशिश करते हैं कि उनका भला करने वाला कोई ओर नहीं है सिर्फ वही हैं और जनता भी नेताओं के बहकावे में आ जाते है।
पहले पहाड़ी जिलों की बात करें तो पहाड़ी जनपदों में स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार सबसे बड़ा मुद्दा था और आज भी है। पहाड़ी जिलों में स्वास्थ्य सुविधा का ऐसा बुरा हाल है कि यहां अस्पताल तो बने हैं, लेकिन उनमें डाक्टर और स्वास्थ्य सुविधाओं का भारी अकाल है। इससे ऐसा लगता है कि अस्पताल सफेद हाथी के समान है। आमजन स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार को लेकर सड़क से सदन तक अपनी मांग रख चुकी है, लेकिन सरकार आंकड़ों की बाजीगरी खेलकर आमजन को चुनावी साल में वादों की झड़ी लगाकर फिर से खेल खेल देती है।
यही हाल प्रदेश के पहाड़ी जनपदों में शिक्षा और रोजगार का भी है। शिक्षा के नाम पर स्कूल भवन जो सालों पहले बने थे आज भी वैसे ही है। स्कूलों में शिक्षक तो है, लेकिन उन स्कूलों में अब पढ़ने वाले बच्चों की संख्या इतनी कम है कि अब सरकार को मजबूरन उन्हें बंद करने के लिए सोचना पड़ रहा है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण पहाड़ी जिलों में रोजगार का है। पहाड़ी जनपदों में रोजगार की कमी के कारण आज गांव के गांव खाली होने की कगार पर है। पहाड़ में जो संपन्न है वह मैदानी क्षेत्रों की ओर रूख कर चुका है और जो गांवों में बचे है वह मजबूरी में जिंदगी और मौत के बीच जीवन काट रहे है।
पहाड़ी जिलों में समस्याओं का अंबार है और इनसे उन्हें छुटकारा नहीं मिल पा रहा है। इसके पीछे कारण जो भी हो, लेकिन इसे प्रदेश सरकार की नाकामी ही कहा जा सकता है। क्योंकि जिस उददेश्य से राज्य का गठन हुआ था वह कही दिख तो रहा नहीं है और आमजन यह कहने को मजबूर है कि इससे अच्छा तो हम यूपी में ही ठीक थे। वैसे तो सरकार ने अनेक योजनाओं के माध्यम से पहाड़ी जिलों का विकास करना चाहा, लेकिन कोई भी योजना धरातल पर क्यों नहीं उतरती है यह यक्ष प्रश्न है, जो लंबे समय से अनुतरीय है और शायद रहेगा।
पहाड़ का भाग्य पहाड़ जैसा ही है और यहां के लोगों के लिए तो राज्य बनने से पहले और आज भी वैसे का वैसा ही है। वर्तमान विधानसभा सत्र में सरकार ने प्रदेश के शहरों के लिए योजना तैयार कर उसके लिए बजट का प्रावधान किया है। चुनावी साल है और कुछ नया तो करना ही पडे़गा। अगर ऐसा नहीं किया तो मतदाता नाराज हो जाएंगे। प्रदेश सरकार ने पर्वतीय शहरों को स्मार्ट सिटी की तर्ज पर विकसित करने का मास्टर स्ट्रोक चल दिया है, जिससे आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करने और आधुनिक नगरीय व्यवस्था को विस्तार देने में मदद मिलेगी।
प्रदेश सरकार का फोकस शहरों में सुरक्षित और सुगम आवागमन, बेहतर आधारभूत ढांचे और योजनाब( नगरीय विकास पर है। इसके तहत पैदल मार्ग, आवास और अन्य नगरीय सुविधाओं के विस्तार से नागरिकों को अधिक सुविधाजनक शहरी वातावरण मिलेगा। इसके साथ ही पर्यटन और अन्य आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। प्रदेश सरकार के चुनावी साल में इस मास्टर स्ट्रोक से आमजन क्या सोचती है यह तो आने वाले विधानसभा चुनाव में पता चलेगा, लेकिन यह अवश्य है कि अगर सरकार की यह योजना धरातल पर उतरती है तो इससे कुछ हद तक पलायन पर ब्रेक लग सकता है।

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