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राजनीति का महाभारत

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यूं तो राजनीति का क्षेत्र हमेशा ही महाभारत का कुरुक्षेत्र रहा है लेकिन 2014 से 2024 के एक दशक में राजनीति के इस कुरुक्षेत्र में झूठ, फरेब भय और भ्रम के सहारे इस देश की सत्ता को हथियाए रखने की जो कोशिश की गई है वह अब अपने अंतिम मुकाम तक पहुंच चुकी है। बीते 10 सालों के शासनकाल में सत्ता ने क्या—क्या गलत फैसले लिए तथा इन फैसलों से देश की अर्थव्यवस्था तथा सामाजिक व्यवस्था को कितना नुकसान हुआ? यह एक अलग सवाल है इन सभी ऐसे फैसलों के पीछे के उद्देश्य क्या थे? यह सवाल और भी ज्यादा अहम है। उदाहरण के तौर पर आप नोटबंदी के उसे फैसले को ले सकते हैं जो देश से काले धन को समाप्त करने और आतंकवाद को हतोत्साहित करने के नाम पर लिया गया। सही मायने में इस नोटबंदी का उद्देश्य देश के कुछ बड़े लोगों के काले धन को सफेद करना ही था। और इसमें 100 प्रतिशत सफलता भी मिली। कोरोना काल में बनाए गए पीएम केयर फंड में लोगों ने कितना जमा किया और इसका क्या और कहां उपयोग किया गया इसका कोई हिसाब किताब नहीं जान सकता। वह चुनावी बाण्ड (चुनावी चंदा) कानून ने जिसे असंवैधानिक करार देते हुए देश की सर्वाेच्च अदालत ने रद्द कर दिया था से लेकर उन तीन कृषि कानूनों को वापस लेने तक जिनके विरोध में सालों तक देश के किसान सड़कों पर पड़े रहे अनेक ऐसे मामले और मुद्दे हैं जो सरकार की कार्य प्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान लगाते हैं। बीते लोकसभा चुनाव से लेकर हरियाणा, दिल्ली व महाराष्ट्र एवं मध्य प्रदेश के चुनाव के दौरान हुई चुनावी धांधलियों को लेकर निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली तथा आयुक्तों की नियुक्तियों पर उठने वाले सवाल भी किसी से भी छिपे नहीं है। आयुक्तों की नियुक्ति के नियमों में किए गए बदलाव और इस चुनावी धांधलियों के खिलाफ छिड़ी जंग में स्थिति का उसे विस्फोटक हालत में पहुंच जाना जहां नेता विपक्ष इस पर बड़े खुलासे की बात कर रहे हैं और वोट की चोरी के उसे षड्यंत्र के दोषियों को न छोड़ने की चेतावनी खुलेआम दे रहे हैं, इस बात को बताने के लिए काफी है कि अब यह लड़ाई निर्णायक दौर में पहुंच चुकी है। राहुल गांधी जिस तरह से इस बात की गारंटी दे रहे हैं कि उनके पास इस बात के पुख्ता सबूत है कि निर्वाचन आयोग किस तरह से सत्ता के लिए वोटो की चोरी कर रहा है तो यह कोई मामूली बात नहीं है। लोकतंत्र के अस्तित्व को ही मिटा देने वाले इस मुद्दे को कोई भी हल्के में नहीं ले सकता न सरकार और न सुप्रीम कोर्ट। इसे लेकर अब सत्ता पक्ष के नेताओं में तो बेकली है ही साथ ही कुछ लोगों द्वारा राहुल गांधी की हत्या कराये जाने की आशंकाओं के मद्दे नजर उनकी सुरक्षा बढ़ाने की मांग भी की जा रही है। उधर सुप्रीम कोर्ट में निर्वाचन आयोग द्वारा ऐन चुनाव से पूर्व बिहार की मतदाता सूचियाें के पुनः निरीक्षण के नाम पर 90 लाख से अधिक मतदाताओं से मताधिकार छीनने और उनका नाम सूची से काटे जाने के मामले की सुनवाई भी चल रही है जिसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर किसी संस्था चाहे वह कार्य पालिका ही क्यों न हो अगर संवैधानिक नियमों के विरुद्ध कुछ भी किया जाएगा तो अदालत चुप नहीं बैठे रहेगी। सुप्रीम कोर्ट उसमें हस्तक्षेप करेगा ही क्योंकि संविधान की सुरक्षा उसका पहला कर्तव्य है। तमाम स्तरो पर सत्ता के साथ संघर्ष जारी है। सत्ता में बैठे लोगों में इस बात का डर है कि अगर सत्ता गई तो फिर उनके वह तमाम फैसले खुलना तय है। इस राजनीति के महाभारत का क्या होगा इसे आने वाला समय तय करेगा।

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