देहरादून के जिलाधिकारी सविन बंसल को कल राजधानी में आयोजित समारोह में ट्टलोकरत्न हिमालय’ सम्मान से नवाजा गया। यह सम्मान उन्हें पर्वतीय बिगुल सामाजिक सांस्कृतिक संस्था द्वारा प्रदान किया गया। सम्मान ग्रहण करने पर जिलाधिकारी सविन बंसल द्वारा कहा गया कि वह इस सम्मान को उन सभी अधिकारियों, क्रमिकों तथा मीडिया कर्मियों को समर्पित करते हैं जो लोक सेवा की कार्यप्रणाली की मूल भावना को समझते हैं। सविन बंसल जो खुद एक लोक सेवक हैं उनके द्वारा चंद शब्दों में कही गई यह बात वर्तमान दौर की नौकरशाही और मीडिया कर्मियों के लिए गहरे नितार्थ रखती है वही इस दौर के उन नेताओं से जो स्वयं को जनसेवक होने का ढिंढोरा पीटते हैं लेकिन उनके आचरण में लोक सेवा से ज्यादा अपने निजी और राजनीतिक स्वार्थ ही उनकी प्राथमिकता रहती हैं। हमें यह कहते हुए कतई भी संकोच नहीं है कि वर्तमान दौर में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाला मीडिया उस लोकहित के मूल भाव को त्याग कर सिर्फ सत्ता की चाटुकारिता को ही पत्रकारिता मान बैठा है। उसे शासन प्रशासन स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार और अन्याय से कोई सरोकार नहीं रह गया है। यही कारण है कि वर्तमान दौर में इन मीडिया कर्मियों को गोदी मीडिया जैसे संबोधनों से नवाजा जा रहा है और विपक्षी नेता खुले मंचों से उन्हें आईना दिखाने में कोई संकोच नहीं कर रहे हैं। अपनी इस दुर्दशा के लिए कोई और नहीं खुद मीडिया ही जिम्मेदार है। बात अगर जिलाधिकारी सविन बंसल की, की जाए तो उन्हें लेकर अभी बीते दिनों हुई दो घटनाओं पर गौर किया जाना जरूरी है। बीते दिनों लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला दून दौरे पर आए थे लेकिन जिलाधिकारी उनके स्वागत के लिए एयरपोर्ट नहीं पहुंचे। प्रोटोकॉल के उल्लंघन का यह मामला लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को अपनी शान में एक इतनी बड़ी गुस्ताखी नजर आई कि उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई व लिखत—पढ़त शुरू हो गई उससे आगे बढ़कर मीडिया का एक वर्ग भी डीएम सविन बंसल पर टूट पड़ा। सुनने में आया कि दिल्ली से मुख्यमंत्री पर उनके खिलाफ कार्रवाई का दबाव बनाया गया। इसके तुरंत बाद एक और केंद्रीय मंत्री राममोहन नायडू दून आए तब भी डीएम सविन बंसल उनका स्वागत करने नहीं पहुंचे तो इस मामले को तूल देने वालों को एक और मौका मिल गया। सवाल यह है कि क्या किसी ने भी यह जानने की कोशिश की कि वीआईपी प्रोटोकॉल को तवज्जो न देने वाले डीएम बंसल उस समय क्या कर रहे थे और उनकी नजर में क्या मंत्रियों व नेताओं के स्वागत की बजाय अपनी ड्यूटी को ज्यादा प्राथमिक क्यों समझा गया? कल नवीन बंसल द्वारा अपने सम्मान समारोह में कही गई एक मात्र बात से उन्हें शायद इन सवालों का जवाब मिल गया होगा। अब जरा सविन बंसल के उस लोक सेवा के भाव और भावना की भी बात कर लेते हैं जो बीते कुछ दिनों में चर्चाओं के केंद्र में रही। एक बुजुर्ग महिला की वह तस्वीर आपने देखी होगी जिसमें वह डीएम बंसल के कार्यालय में वह उनके कंधे पर हाथ रखकर अपनी समस्या उन्हें बता रही है। एक तस्वीर आपको यह भी याद होगी जब डीएम एक शराब के ठेके पर लाइन में खड़े होकर शराब खरीद रहे थे और ओवर रेटिंग के खिलाफ कार्रवाई कर रहे थे। एक बुजुर्ग दंपत्ति को अपने ही बेटे व उसकी पत्नी के उत्पीड़न पर कार्यवाही करते हुए उन्हें उनकी संपत्ति पर हक दिलवाते हैं यह उनके द्वारा काम करने की एक मिसाल भर है उनके द्वारा हर रोज अपनी ड्यूटी का निर्वहन कुछ इसी अंदाज में किया जाता है हर जाति धर्म और वर्ग के लोग उनकी जन अदालत में जिन समस्याओं को लेकर जाते हैं वह समाधान के साथ और उन्हें आशीष देते हुए लौटकर आते हैं। यह विडंबना ही है कि डीएम बंसल जैसे लोक सेवक जिनकी संख्या अब गिनती की ही बची है उन्हें भी कुछ लोग अपना काम नहीं करने देना चाहते हैं। मीडिया के तमाम प्लेटफार्म और पत्रकारों का एक तबका उनके पीछे पड़ा है उनके तबादले या उनके खिलाफ कार्रवाई कराने के लिए कुछ नेता और अधिकारी भी अपना हित तलाश रहे हैं। लेकिन एक ऐसा वर्ग भी है जो उनकी सेवाओं की सराहना और सम्मान भी करता है क्योंकि वह उन्हें इसका उचित पात्र मानता है।



