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हादसों के बीच चारधाम यात्रा

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बात चाहे सड़क हादसों की हो या फिर हेलीकॉप्टर क्रैश जैसी दुर्घटनाओं की। आए दिन एक के बाद एक बड़ा हादसा सामने आने से चार धाम यात्रियों में अपनी सुरक्षा को लेकर जो सवाल उनके मन को मथ रहे हैं वह चिंतनीय है। सड़क मार्गों पर इन दिनों तमाम तरह की असुविधाओं व असुरक्षा से यात्रियों का परेशान होना स्वाभाविक है। कहीं भूस्खलन की जद में आने से यात्रियों को जान से हाथ धोने पड़ रहे हैं तो कहीं रास्ता बंद होने से कई—कई घंटे तक जाम में उलझे यात्री परेशान हो रहे हैं। कहीं अनियंत्रित वाहन खाई और नदियों में गिर रहे हैं तो कहीं सड़कों के बहने से वहां की आवाजाही प्रभावित हो रही है। बीते कल हुए एक बड़े सड़क हादसे में तीन लोगों की जान तो चली ही गई जो नौ लोग लापता है अब उनके जीवित होने की संभावनाएं लगभग समाप्त हो चुकी है। अलकनंदा के तेज बहाव में अब उनके शवों को भी तलाशना मुश्किल हो रहा है। अभी इससे पूर्व एक हेलीकॉप्टर क्रैश की घटना में पायलट सहित सात लोगों की जान चली गई थी। तब से हेली सेवा बाधित पड़ी है जिसे अब मानसून काल के बाद ही शुरू किए जाने की संभावना है। कल एक बार फिर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा अधिकारियों के साथ बैठक कर सड़क सुरक्षा के और अधिक बेहतर इंतजाम करने के आदेश दिए गए हैं हर एक हादसे के बाद जो एक फॉर्मेलिटी जैसा बनकर रह गया है। खास बात यह है कि हर बार सरकार बेहतर इंतजाम और यात्रियों की सुरक्षा को लेकर वायदे और दावे तो तमाम करती है लेकिन नतीजा हमेशा ढाक के तीन पाथ ही रहता है। वर्तमान समय में जब लगातार हेलीकॉप्टर दुर्घटनाएं हुई तो राज्य में संचालित होने वाली हेली सेवाओंं में खटारा हेलीकॉप्टरों के उपयोग की बात सामने आई थी ठीक उसी तरह अब सड़क हादसों को लेकर भी वाहनों की फिटनेस और जांच पर सवाल उठ रहे हैं। सड़कों की खराब स्थिति की बात किसी से नहीं छुपी है वहीं दुर्घटना के लिहाज से जो संवेदनशील जोन है उनमें किए जाने वाले ट्रीटमेंट प्लांट भी सवालों के घेरे में हैं। पहाड़ों के रास्तों पर जो समस्याएं होती है वह तो अलग बात है किंतु यात्रा शुरू होने तक भी सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम न हो पाना और यात्रा के दौरान भी मरम्मत का काम जारी रहना यात्रा की तैयारियों पर सवाल खड़े करता है। यात्रा काल समाप्त होने के बाद सरकार कितने यात्री आये, कितनी दुर्घटनाएं हुई और कितने लोगों की जानें गई इसके आंकड़े देख भर लेती है। चार धाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं के साथ जब ऐसा कोई बड़ा हादसा हो जाता है जिसमें उनकी जान चली जाती है तो इससे उनके परिवार को कितना सदमा और दुख पहुंचता है इसकी पीड़ा का एहसास सिर्फ परिजनों को ही होता है। मंगल की कामना लेकर यात्रा पर आने वाले किसी भी श्रद्धालु के साथ कुछ अमगल न हो तथा वह उत्तराखंड से यात्रा की सुखद अनुभूतियों के साथ अपने घर लौटकर जा सके? सरकार को इसके लिए बेहतर और पुख्ता इंतजाम करने की जरूरत है। अभी मानसूनी आपदाओं का दौर शुरू भी नहीं हुआ है मानसून काल में यात्रियों की सुरक्षा का मुद्दा और भी अधिक गंभीर हो जाता है जिस पर ध्यान देने की जरूरत है।

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