भाजपा के नेता सिर्फ अपने मन की बात करते हैं, जन मन की बात सुनने की उनकी आदत नहीं है। उनका मानना है कि लोगों को कुछ न कुछ तो कहना ही है। क्योंकि लोगों का काम ही कुछ न कुछ कहना है लोगों को कहने दीजिए हम सिर्फ अपनी ही बात सुनते हैं और किसी की भी नहीं इसलिए किसी की भी बात का कोई जवाब न दिया जाए ऐसी स्थिति में हर बात महत्वहीन हो जाती है। उन्हें पता है कि एक चुप सौ को हराने के लिए काफी होता है। इसलिए चुप रहना ही श्रेष्ठ है। केंद्र की सरकार इन दिनों 11 साल का जश्न मना रही है भाजपा नेताओं के हाथों में इन 11 सालों की कई सौ उपलब्धियाें की सूची है इस सूची में ऑपरेशन सिंदूर की कामयाबी की बहुत सारी उपलब्धियां हैं। गोली के जवाब में नेताओं द्वारा खूब गोले दागे जा रहे हैं। कराची और इस्लामाबाद तक जीतने से लेकर पीओके को जीत लेने तक न जाने क्या—क्या है। जिसका डंका बजाकर हमारे सांसद और मंत्री विदेश की सैर से लौट आए हैं। तथा वह पीएम के साथ फोटो सेशन का हिस्सा बने हुए हैं। सरकार भी खुश है कि उन्होंने पूरे विश्व को बता दिया है कि पाकिस्तान कितना बड़ा आतंकवादी देश है। लेकिन इनमें से कोई भी इस बात का जवाब नहीं दे रहा है कि आतंकवादियों को घर में घुसकर मारने में भारतीय सेना को कितने जान माल का नुकसान हुआ जब भारत के हमले से पाकिस्तान थर—थर कंाप रहा था तो फिर इन हमलों को अचानक क्यों रोक दिया गया। सीज फायर का ऐलान अमेरिका के राष्ट्रपति ने क्यों किया। संवाद सही मायने में द्विपक्षीय ही होता है लेकिन वर्तमान सरकार ने संवाद को एक पक्षीय बना दिया है। अगर कोई पूछने लगे कि आपके शौर्य का डंका कहां—कहां बज रहा है? तो इसका कोई जवाब दूसरे पक्ष से नहीं आएगा। अगर कोई पूछने लगें की पहलगाम और पुलवामा के आतंकियों का क्या हुआ वह कहां गए तो इसका जवाब देने वाला कोई नहीं है। भाजपा के नेताओं द्वारा जनसभाओं में कहा जा रहा है कि गुनहगार अगर पाताल में भी जाकर छिपे होंगे तो हम उन्हें ढूंढ कर ला तो सकते हैं ही साथ ही साथ उन्हें ऐसी सजा भी देंगे जो आज तक किसी ने भी किसी को नहीं दी होगी। भले ही भाजपा के नेता पूर्व पीएम मनमोहन सिंह को मौन मोहन बताकर उनका उपहास उड़ाते रहे हो लेकिन वह भी साल में दो—चार बार तो पत्रकारों से वार्ता कर ही लेते थे। लेकिन वर्तमान पीएम मोदी ने तो 11 सालों में एक भी बार पत्रकार वार्ता नहीं की और न पत्रकारों के सवालों का जवाब ही दिया है। संवाद हीनता का कारण क्या है इसका भी कोई जवाब नहीं देता है। प्रधानमंत्री जो स्वयं को डिसिप्लिंड सोल्जर बताते हैं क्या इसका मतलब चुप रहना है। ऐसा नहीं है कि उन्हें बोलना नहीं आता है और अगर ऐसा होता तो वह जनसभाओं में इतना ज्यादा नहीं बोल रहे होते कि लोग उन्हें पीएम से भी बड़ा पीएम होने की बात कहते हुए उन्हें प्रचार मंत्री न बता रहे होते। सरकार ने अपने प्रचार में अब भाजपा ही नहीं अन्य सभी दलों की फौज को मैदान में उतार कर यह सिद्ध कर दिया है कि अब लोकतंत्र में संवाद नहीं सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण प्रचार हो गया है। वह भी इस स्तर पर कि भय और भ्रम की एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी गई है कि लोगों का यह समझना भी मुश्किल हो चुका है कि सच क्या है और झूठ क्या है।



