ओलंपिक 2024 पेरिस का भारतीय सफर एक रजत और पांच कांस्य यानी छह पदकों के साथ समाप्त हो चुका है। खेलो इंडिया और अबकी बार 10 के पार के साथ पेरिस रवाना होने वाला दूसरा सबसे बड़ा भारतीय दल भारत लौट आया है। सोने का तमगा जीतने की तमन्ना तो दूर इस बार भारत अपने 3 साल पहले टोक्यो के प्रदर्शन जिसमें उसने दो रजत और पांच कांस्य पदक सहित सात पदक जीते थे उसकी बराबरी भी वह नहीं कर सका और विश्व रैंकिंग में पहली बार वह शीर्ष 70 की सूची से बाहर हो गया, यही नहीं पाकिस्तान जैसे देश भी उससे आगे निकल गए। राष्ट्रवाद का ढिंढोरा पीटने वाले देश के राजनीतिज्ञोंं को इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि ओलंपिक खेल जो राष्ट्रवाद का एक प्रतीक बन चुके हैं उस लाइन में उनका राष्ट्रवाद कहां खड़ा है? और खेलों में उनके राष्ट्रवाद के फिसड्डी साबित होने के पीछे क्या कारण निहित है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत में खेल प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। इस बार पेरिस ओलंपिक में 64 प्रतियोगिताओं में भारतीय खिलाड़ी चौथे स्थान पर रहे। पदक से एक कदम पीछे रहने वाले इन सभी खिलाड़ियों को पदक मिल सकता था लेकिन ऐसा नहीं हो सका। वही महिला कुश्ती में विनेश ने पहली बार चार बार की चौंपियन और ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट खिलाड़ी को पछाड़कर फाइनल में पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी के रूप में अपना नाम तो दर्ज करा लिया लेकिन दुर्भाग्यवश 100 ग्राम वजन अधिक होने के कारण उन्हें प्रतियोगिता से बाहर होना पड़ा अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो वह स्वर्ण पदक भी जीत सकती थी लेकिन उसका कम से कम रजत पदक तो पक्का था ही। खिलाड़ियों के इस प्रदर्शन की बात करते हुए यह भी साफ है कि भारत की झोली में 6 के स्थान पर यह पदक संख्या 12—13 तक भी जा सकती थी। भारत में इन खिलाड़ियों के साथ जो अधिकारियों और सपोर्टर की 177 लोगों की टीम भेजी गई थी वह वहां क्या करने गई थी सिर्फ सरकारी खर्चे पर मौज करने। यह सवाल कोई नया नहीं है, बात खेल संघो और अधिकारियों की करी जाए तो इसमें नीता अंबानी तक का नाम शामिल है। उन सभी की क्या भूमिका रहती है या होनी चाहिए इसकी जांच किया जाना जरूरी है खेल संघो और खेल मंत्रालय में बैठे अनेक लोगों का न तो खेलो से दूर—दूर तक कोई वास्ता रहा है और न उन्हें खेलों की एबीसीडी का कोई ज्ञान है। वह किसी खिलाड़ी का क्या भला सोच या कर सकते हैं यह समझने की बात है। खेल संघों को राजनीति का अखाड़ा बनाने वाले लोग इन खिलाड़ियों का शोषण और उत्पीड़न करने के सिवाय उनका कोई भला नहीं कर सकते हैं। बीते दिनों देश की जिन महिला पहलवानों ने जंतर मंतर पर अपने शोषण के खिलाफ आवाज उठाई गई थी उनकी आवाज को जब सुनाने वाला कोई नहीं होगा तब हम अपने खिलाड़ियों से किस तरह के अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद कर सकते हैं। हम जो बो रहे हैं वही तो हम काट भी रहे हैं। इसमें हम किसी भी खिलाड़ी को भला कैसे दोषी ठहरा सकते हैं। विनेश के साथ दिल्ली से लेकर पेरिस तक जो कुछ हुआ उसे लेकर उठने वाले सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इन स्थितियों व परिस्थितियों में न तो कोई खिलाड़ी अपना बेहतर प्रदर्शन कर सकता है और न देश के लिए खेल के मैदान में अपना झंडा गाड़ सकता है।


