हम हैं तो कांग्रेस है, अगर हमारी बात नहीं मानी या हमारी उपेक्षा की तो कांग्रेस हार जाएगी। अगर हरीश रावत जैसे नेता इस सोच के साथ राजनीति करने या पार्टी में अपना वजूद कायम रखने पर आमादा है तो यह कांग्रेस के लिए चिंता का विषय हो सकता है लेकिन हरीश रावत जैसे नेताओं को इस बात का गुमान है कि कांग्रेस का वजूद सिर्फ उन जैसे नेताओं के कारण है तो इससे बड़ा शायद मुगालता कुछ और नहीं हो सकता है। हरीश रावत जैसे नेताओं को एनडी तिवारी जैसे नेताओं से सबक लेने की जरूरत है कि कांग्रेस को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है कि वह किसी राज्य में एक बार चुनाव हारी या तीन बार हार गई। लेकिन कांग्रेस में तानाशाही के दम पर अपना वर्चस्व बनाने की कोशिश करने वाले अब तक न जाने कितने नेता आए और चले गए। इस बात को समझने के लिए हरीश रावत जैसे नेताओं को कांग्रेस के इतिहास को समझने की जरूरत है। जो मुट्ठी भर नेताओं और कार्यकर्ताओं के दम पर कांग्रेस को चुनौती देने का काम कर रहे हैं। कांग्रेस किसी व्यक्ति विशेष की पार्टी नहीं है वह विचारधारा है जो भाजपा जैसे विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक दल को चुनौती देने की हिम्मत रखती है राहुल गांधी जो इन दिनों कांग्रेस के लिए अपनी जान की बाजी लगाए हुए हैं इसका एक उदाहरण है। जिन्होंने खुले मंचों से ऐलान कर रखा है कि जिसे कांग्रेस के साथ रहना है रहे जिन्हें नहीं रहना है उनके लिए दरवाजे खुले हैं बाहर जा सकता है। एक नहीं बीजेपी से डरे हुए सैकड़ो नेता वह चाहे कांग्रेस के हो या फिर किसी भी अन्य दल के भाजपा की शरण में जा चुके हैं। लेकिन 11 सालों तक सत्ता से बाहर रहकर भी भाजपा के खिलाफ मोर्चा संभालने वाली कांग्रेस न भाजपा से डरी है और न अपनी पराजय से निराश हुई है राजनीति सिर्फ निजी हितों के लिए की जाने वाली चीज नहीं है राहुल गांधी ने खुद की जान की बाजी लगाकर यह कांग्रेसियों को समझाने का प्रयास किया जा रहा है जो समझ सकते हैं वह उनकी भावनाओं को समझें और जिन्हें नहीं समझना है वह न समझे। लेकिन कांग्रेस ने तो अपना रास्ता चुन लिया है कौन उसके साथ रहेगा और कौन नहीं रहेगा। किसके जाने और रहने से क्या नफा नुकसान होगा इससे अब कांग्रेस और राहुल गांधी पूरी तरह से बेपरवाह हो चुके हैं और यही उनकी सबसे बड़ी जीत है जिसके कारण वह आज लोकप्रियता के ग्राफ में प्रधानमंत्री मोदी को भी बहुत पीछे छोड़ चुके हैं। उत्तराखंड कांग्रेस में इन दिनों कांग्रेस के नेताओं में अपनी अहमियत की जो जंग जारी है वह राहुल गांधी और कांग्रेस की सोच के साथ कहीं भी मेल नहीं खाती है। इस स्थिति में मुझे सिर्फ कबीर की वह सूक्ती ही सार्थक प्रतीत होती है ट्टकबीरा खड़ा बाजार में लिए लुकाटा हाथ, जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ’। ऐसे में राहुल गांधी और कांग्रेस के साथ वही चल सकते हैं जिनके अंदर अपने निजी स्वार्थ का परित्याग करने की हिम्मत हो, बाकी लोगों का अखाड़े से बाहर जाना ही उनके तथा कांग्रेस के हित में होगा।




