ईरान—इजराइल युद्ध में ईरान ने न सिर्फ इसराइल सहित अमेरिकी समर्थित तमाम मिडल ईस्ट के देशों को अपनी ताकत का लोहा मानने पर मजबूर कर दिया है बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को भी घुटनों पर ला दिया है। इस युद्ध को एक माह बीत चुका है, भारी जान माल के नुकसान के बावजूद भी ईरान के हौसलों में किसी तरह की कमी नहीं आई है। जबकि इसराइल और अमेरिका अब इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि ईरान की मिसाइल का जखीरा कब खत्म होता है। इस युद्ध में ईरान को न रोक पाने के कारण विश्व के तमाम देशों के सामने जो गंभीर एनर्जी संकट पैदा हो गया उसे लेकर अब भारी बेचैनी बढ़ती जा रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने अब अपने राष्ट्र को संबोधित करते हुए यह साफ कर दिया है कि उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि युद्ध कब रुकेगा लेकिन अब उन्होंने इस युद्ध से अपने आप को अलग कर लिया है उनका कहना है कि हमारा उद्देश्य था ईरान को इतना पीछे धकेल देना कि वह परमाणु हथियार न बना सके और इसमें वह सफल हो चुके हैं भले ही ट्रंप की बात पर कोई भरोसा करने को तैयार नहीं है लेकिन अमेरिका सहित ब्रिटेन के पीएम तथा ऑस्ट्रेलिया के पीएम के साथ भारत के प्रधानमंत्री द्वारा अपने—अपने राष्ट्र को एक साथ संबोधित किए जाने की घटनाओं को एक साथ जोड़कर देखा जाए तो यह साफ हो जाता है कि इस युद्ध से जो संभावित बड़ा खतरा पैदा हुआ है वह अभी टला नहीं है बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अब कुछ बड़ा होने जा रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह पहला मौका है जब विश्व के चार राष्ट्रों के राष्ट्रीय अध्यक्षों को एक साथ अपने देश को संबोधित करने की स्थिति पैदा हुई है। भारत में इसे लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही देशवासियों को कोरोना काल जैसे संकट का सामना करने के लिए तैयार रहने की बात कह चुके हैं। अब वैसी संभावनाएं ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री द्वारा जताया जाना तथा चीन के राष्ट्रपति का भी यह कहना कि कुछ बड़ा होने वाला है तृतीय विश्व युद्ध की ओर इशारा करता है। क्या होने वाला है भले ही इसके बारे में कोई कुछ नहीं कह सकता है सिर्फ अनुमान और कयास ही लगाये जा सकते हैं लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है की स्थिति अत्यंत ही गंभीर बन चुकी है। आधे से अधिक विश्व राष्ट्रों की सप्लाई लाइन को रोके जाने के कारण तमाम देशों में गैस, तेल और अन्य जरूरी सामानों की कमी होने से हालात खराब हो रहे हैं तथा तमाम देशों की अर्थव्यवस्था डावंाडोल होती जा रही है। भले ही भारत और अमेरिका जैसे देश हालत को सामान्य बताते रहे लेकिन ऐसा है नहीं। भारत में पेट्रोल, डीजल व गैस की अगर कमी नहीं है तो क्यों केरोसिन तेल से प्रतिबंध समाप्त करने का फैसला लिया गया है क्यों आए दिन इन वस्तुओं के लिए नियम कानून बदले जा रहे हैं। क्यों 200 से अधिक दवाओं की कीमतें बढ़ाई गई हैं यही नहीं देश में पीएम व रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की सैन्याध्यक्षों के साथ हाई लेवल बैठके हो रही है? इस युद्ध के कारण भारत ही नहीं तमाम देशों की मुश्किलें लगातार बढ़ती ही जा रही है। इस इस युद्ध से विश्व राष्ट्रों के सामने एक अनिश्चितता का जो माहौल बन चुका है वह अत्यंत ही चिंतनीय है जिसका समाधान युद्ध विराम और शांति के सिवाय कुछ नहीं है।




