अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की अर्थव्यवस्था को एक मरी हुई (डेड इकोनामी) अर्थव्यवस्था बताते हुए रूस से तेल न खरीदने की चेतावनी दी गई और भारत पर 58 प्रतिशत का टैरिफ लगा दिया है और साथ में जुर्माना भी। तो हर एक भारतीय के मन में यह सवाल जरूर घूम रहा होगा कि क्या ट्रंप यह सही कह रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था का दम निकल चुका है। यह बात इसलिए और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है कि भारत इसका कोई खंडन या विरोध नहीं कर रहा है। वित्त मंत्री सीतारमण ने एक बार भी यह क्यों नहीं कहा कि अमेरिका के राष्ट्रपति झूठ बोल रहे हैं हमारी अर्थव्यवस्था तो अब विश्व की चौथी सबसे बड़ी और मजबूत अर्थव्यवस्था है और अब कुछ दिनों में वह तीसरे नंबर पर आने वाली है। प्रधानमंत्री मोदी तो ट्रंप की किसी बात का विरोध कर ही नहीं सकते हैं क्योंकि ट्रंप मोदी के परम मित्र हैं वह भले ही भारत और मोदी के बारे में कुछ भी कहे। ट्रंप ने आदेश दिया और मोदी ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया और अब वह अमेरिका से तेल खरीद रहा है। हो सकता है कि ट्रंप ने जैसा कहा है कि भारत पाकिस्तान से तेल खरीदेगा हो सकता है आने वाले समय में यह भी संभव हो जाए। क्योंकि इस देश में अब मोदी है तो कुछ भी मुमकिन है। अभी आपने और हमने सभी ने देखा कि प्रवासी भारतीयों को कैसे हथकड़ियां लगाकर अमेरिका से भारत लाया गया था लेकिन इस अमानवियता पर क्या देश की सरकार का कोई मंत्री या प्रधानमंत्री एक भी शब्द बोल पाये था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो देशवासियों को अच्छे दिनों के आने का झांसा देकर तथा हर गरीब के खाते में 15 लाख डालने और विदेशों में जमा काला धन वापस लाने का झूठ बोलकर 2014 में सत्ता में आये थे वह अब तक यह समझ चुके हैं। नोटबंदी और बेरोजगारी तथा गलत नीतियों के कारण अब इस देश की अर्थव्यवस्था की पूरी तरह से बैंड बज चुकी है। अब पीएम मोदी भी देशवासियों को यह बात और समझा रहे हैं कि विश्व राष्ट्रों की अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव हो रहे हैं इसलिए हमें भी सजग रहने की जरूरत है। अब वह युवाओं को रोजगार, हमारे किसान, हमारे देश के लघु उघोग और युवाओं के हित हमारे लिए सर्वाेपरी है। प्रधानमंत्री से यह पूछने वाला कोई नहीं है कि आपने बीते 11 सालों से किसानों, बेरोजगार युवाओं के हितों को क्यों खूंटी पर लटका कर रखा क्यों आपको इसकी याद नहीं आयी। क्यों 2 करोड़ हर साल रोजगार का वायदा कर आप उन्हें यह कहकर उनका मजाक बनाते रहे कि पकोड़ा तलना भी रोजगार ही है क्यों उन्हें उन्मादी भीड़ बनाते रहे तो गौ रक्षा के नाम पर अवैध वसूली, हिंसा कराते रहे हैं। क्यों किसानों की आय दोगुनी करने के नाम पर उन्हें तीन कृषि कानूनाें के खिलाफ सड़कों पर रहने के लिए विवश कर दिया क्यों आज तक उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी का कानून देने से कतराते रहे हैं। अब जब सब कुछ बर्बाद हो चुका है तो फिर देश के लोगों को उनके कर्तव्यों का पाठ पढ़ा रहे हैं कि हम एकजुट होकर स्वदेशी का संकल्प ले। धन्य है आप जो 100 साल पहले के नेताओं के स्वदेशी का संदेश दे रहे हैं। फिर तो गांधी ने बेकार ही चरखा चलाया था व नेहरू ने अपने विदेशी वस्त्रों की होली जलाई थी। आपकी महानता की भला कोई क्या समानता हो सकती है जो 100 साल के पुराने इतिहास को अपनी बड़ी उपलब्धियाें का इतिहास बना सकते है। अपनी पोशाक चश्मा घड़ी की भांति कई बार विदेश यात्राओं के खर्च पर नजर—ए—गौर करना शायद इतने पैसे से इस देश के आधे लोगों की गरीबी मिट जाती।



