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तबाही का जिम्मेदार कौन?

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जब भी कोई बड़ी प्राकृतिक आपदा आती है तब देश के नेताओं से यही सुनने को मिलता है कि प्राकृतिक आपदाओं पर इंसान का कोई बस नहीं होता है और हम सभी यह मान लेते हैं कि इन आपदाओं के सामने हम बेबस हैं। लेकिन ऐसा नहीं है 80 फीसदी प्राकृतिक आपदाओं के पीछे हम इंसानों के द्वारा पैदा किए गए कारण ही निहित होते हैं। यह सच है की प्रकृति के इस रौद्र रूप के पीछे प्रकृति के साथ इंसान द्वारा की जाने वाली वह छेड़छाड़ ही सबसे अहम कारण होती है जो प्रकृति के अंदर असंतुलन पैदा करती है यह असंतुलन जितना बड़ा होता है आपदा का आकार भी उतना ही अधिक गहन और गंभीर होता है। बीते कल उत्तरकाशी के धराली के प्राकृतिक आपदा की लाइव तस्वीरें जान बचाने के लिए दौड़ते भागते लोग और उनके पीछे मौत का दौड़ता वह सैलाब जिसने इस दौड़ में सभी को पछाड़ दिया लोगों की चीख पुकार की आवाज और फिर कुछ ही सेकंड में सब कुछ समाप्त। किसी का भी दिल दहला देने वाली इन तस्वीरों ने पूरे देश को हैरान कर दिया है। शायद आपदा के दौरान मौत का ऐसा लाइव वीडियो कभी किसी ने भी नहीं देखा होगा। 2013 में केदारनाथ में भी कुछ इसी तरह की आपदा आई थी जिसमें मरने वालों की संख्या हजारों में थी जिसका आंकड़ा आज तक भी ठीक—ठीक पता नहीं चल सका है। भले ही धराली की इस आपदा का आकार इतना बड़ा न हो और आपदा स्थल पर भीड़ भी कम रही हो लेकिन इस आपदा में कितने लोगों की जाने गई है इसका सही पता लगाया जाना मुश्किल ही होगा। अब इसे लेकर दून से लेकर दिल्ली तक हड़कंप मचा हुआ है। सेना से लेकर एनडीआरफ की टीमों तक सारी ताकत बचाव व राहत कार्यो में झोंक दी गई है लेकिन आपदा ग्रस्त क्षेत्र में ही हो रही भारी बारिश व 10 से 15 फीट तक जमा गाद और मलबे में अब तक किसी की जान सुरक्षित बची होगी इसकी संभावनाएं शून्य ही है। बीते एक महीने से उत्तराखंड और हिमाचल ही नहीं पूरे हिमालयी राज्यों में प्राकृतिक आपदाओं की बाढ़ आई हुई है। जान माल का जो भारी नुकसान हो रहा है उसकी भरपाई किया जाना संभव भी नहीं है। यहां तक की हिमाचल राज्य के बारे में तो यह भी कहा जा रहा है कि भारत के नक्शे से उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। हालत उत्तराखंड के भी बहुत बेहतर नहीं है। जमीन धसने से जोशीमठ जैसे बड़े और ऐतिहासिक शहरं का अस्तित्व खतरे में है और प्राकृतिक आपदाएं तो जैसे हर रोज मानवीय जीवन के साथ खिलवाड़ कर रही है। पहाड़ भर भराकर गिर रहे हैं और अतिवृष्टि से सड़कों व भवनों का सफाया हो रहा है विडम्बना यह है कि ऐसे खतरनाक हालात पैदा होने के बाद भी पहाड़ों पर लगातार चौड़ी—चौड़ी सड़कों,ं रेल लाइनों और बहुमंजिली इमारतों के निर्माण का काम जारी है तथा 4 महीने चलने वाली चार धाम यात्रा को बारहमासी चलाया जा रहा है। जंगलों का सफाया हो रहा है लेकिन अनियंत्रित विकास का पहिया तेजी से घूम रहा है। अभी 4 दिन पूर्व वाडिया इंस्टिट्यूट के वैज्ञानिकों की एक रिपोर्ट आई है जिसमें उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्राें में 25 ऐसी झीले बनने की बात कही गई है जो कभी भी भीषण तबाही का कारण बन सकती है। धराली की घटना के पीछे भी ऐसी झील का टूटना एक कारण हो सकता है सच यह है कि इंसान खुद ही इस आग से खेल रहा है। पहाड़ पर सैलानियों का बढ़ता दबाव और अधिक कमाई का लालच पहाड़ पर भारी पड़ता जा रहा है जिसे लेकर सरकारे अगर अभी भी नहीं जागी तो पहाड़ को और भी बड़ी—बड़ी प्राकृतिक आपदाओं और तबाही का मंजर देखने के लिए तैयार रहना चाहिए। हम ईश्वर से इस आपदा में मरने वालों की आत्मा के लिए प्रार्थना करते हैं। ट्टओम शांति’

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