कांग्रेस खुद को ही हराने पर आमादा

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अगर कांग्रेस को कोई हरा सकता है तो वह खुद कांग्रेस ही है यह बात आपने कई बार कांग्रेस के बड़े नेताओं से सुनी होगी। कांग्रेस इस समय अपने जीवन काल के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है लेकिन कांग्रेसी अभी भी कांग्रेस को हराने में ही जुटे हुए हैं। पार्टी के वरिष्ठ और बुजुर्ग नेता युवाओं को आगे बढ़ने नहीं देना चाहते हैं और खुद न चुनाव जीत सकते हैं और न दूसरों को जीतने दे सकते हैं, ऐसी स्थिति में अगर कांग्रेसी नेता पार्टी को पुनः पुरानी स्थिति में पहुंचाने की बात करते हैं तो वह मुंगेरीलाल के सपने ही कहीं जा सकती हैं। उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस भी इसका एक उदाहरण है। सूबे के सबसे बड़े नेता कहे जाने वाले हरीश रावत कल तक कह रहे थे कि इस बार वह चुनाव लड़ेंगे नहीं चुनाव लड़वायेंगे। लेकिन चुनाव लड़ाते—लड़ाते वह अब खुद चुनाव मैदान में कूद गए हैं। अभी उन्होंने कुछ दिन पूर्व कहा था कि कांग्रेस अगर किसी दलित चेहरे को मुख्यमंत्री बनाती है तो वह अपनी दावेदारी वापस ले लेंगे लेकिन अब अघोषित तौर पर खुद ही मुख्यमंत्री का चेहरा भी बन गए हैं। उनकी राजनीतिक पाली अब अपने अंतिम मुकाम पर पहुंच चुकी है लेकिन उनकी राजनीतिक महत्वाकाशांए अभी भी युवा दौर में है। पार्टी ने उन्हें चुनाव प्रचार अभियान की कमान क्या सौंपी अब सब कुछ उनकी मनमर्जी से ही हो रहा है। टिकट वितरण से लेकर डॉ. हरक सिंह की वापसी और उनकी पुत्रवधू को टिकट दिए जाने तथा खुद के चुनाव मैदान में उतरने और रामनगर सीट से चुनाव लड़ने से लेकर किशोर उपाध्याय को सभी पदों से हटाए जाने तक सब कुछ वैसा ही हो रहा है जैसा वह चाहते हैं। चुनाव से पूर्व प्रीतम सिंह को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने और गणेश गोदियाल को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाना उनकी ही सोच थी। कल कांग्रेस ने अपनी दूसरी सूची जारी की, जिसमें उन्हें रामनगर सीट से प्रत्याशी बनाया गया है इस सूची के आते ही कांग्रेस में भारी विद्रोह शुरू हो गया है। जिसकी संभावनाएं पहले से ही दिख रही थी, सिर्फ रामनगर की सीट पर ही नहीं जहां से हरीश रावत चुनाव मैदान में हैं बल्कि लाल कुआं, कालाढूंगी और डोईवाला सहित तमाम सीटों पर भारी असंतोष देखा जा रहा है। रणजीत सिंह रावत जो रामनगर सीट से सबसे प्रबल दावेदार थे उन्होंने हरीश रावत के खिलाफ बगावत का शंख फूंक दिया है वह खुद तो निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरने की बात कह ही रहे हैं साथ ही अपने बेटे को भी सल्ट सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ाने की घोषणा कर रहे हैं। अगर रंजीत रावत ऐसा करते हैं तो वह खुद चुनाव जीते न जीते लेकिन हरीश रावत को भी चुनाव नहीं जीतने देंगे यह तय है, यही नहीं वह कांग्रेस को कई सीटों पर भारी नुकसान पहुंचाएंगे। लाल कुआं से पूर्व विधायक हरीश दुर्गापाल और कालाढूंगी से महेश शर्मा जिस तरह विद्रोह पर आमादा हैं वह कांग्रेस के लिए भारी नुकसानदेह साबित हो सकता है। अच्छा होता कि हरीश रावत अपनी राजनीति की सांध्य बेला में चुनाव लड़ने के बजाय चुनाव लड़ाने व कांग्रेस को जिताने का काम करते लेकिन उन्होंने जो फैसले किए वह कांग्रेस और उन्हें दोनों को हरा सकते हैं।

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