- दलेर मेहंदी विवाद में मीका सिंह की एंट्री!
- मीका ने उठाए मंत्री सुबोध उनियाल के व्यवहार पर सवाल
देहरादून। उत्तराखंड के नरेंद्रनगर में कुंजापुरी मेले के दौरान पंजाबी गायक दलेर मेहंदी और कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल के बीच हुए घटनाक्रम ने अब नया मोड़ ले लिया है। दलेर मेहंदी के समर्थन में मशहूर गायक मीका सिंह उतर आए हैं। मीका ने दलेर मेहंदी के लंबे संगीत करियर का हवाला देते हुए मंत्री के व्यवहार पर सवाल उठाए हैं। उनके बयान के बाद यह विवाद और चर्चा में आ गया है।
मीका सिंह ने दलेर मेहंदी के तीन दशक लंबे संगीत सफर का जिक्र करते हुए सवाल किया कि करीब 30 साल से सुपरस्टार रहे गायक को क्या कभी किसी ने शराब पीकर गाते हुए देखा है? मीका के इस बयान को दलेर मेहंदी के समर्थन के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, पूरे घटनाक्रम और मंच पर हुई बातचीत को लेकर अंतिम निष्कर्ष आधिकारिक तथ्यों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।
कुंजापुरी मेले में दलेर मेहंदी की प्रस्तुति के दौरान उनके नशे में होने को लेकर सवाल उठे थे। इसी बीच कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल की मंच पर टोका—टोकी चर्चा का विषय बन गई। अब मीका सिंह के बयान ने बहस को नया आयाम दे दिया है। मामला केवल मंच पर हुए घटनाक्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कलाकार के सम्मान, सार्वजनिक मंच के व्यवहार और आयोजकों की जवाबदेही पर भी सवाल उठने लगे हैं।
मीका सिंह ने अपने बयान के जरिए दलेर मेहंदी के अनुभव और प्रतिष्ठा का हवाला दिया है। दूसरी ओर, इस पूरे प्रकरण में मंच पर वास्तव में क्या हुआ, इस बारे में संबंधित पक्षों के
आधिकारिक पक्ष और उपलब्ध तथ्यों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
दलेर मेहंदी और सुबोध उनियाल के बीच हुए विवाद के साथ ही कुंजापुरी मेले में स्थानीय कलाकारों की भागीदारी का सवाल भी अहम है। उत्तराखंड की पहचान जागर, पांडव नृत्य, झोड़ा, चांचरी, छपेली और हुड़किया बौल जैसी समृद्ध लोकपरंपराओं से है। इन परंपराओं को जिंदा रखने वाले कलाकारों को अपने ही प्रदेश के बड़े आयोजनों में कितना मंच और कितना सम्मान मिलता है, इस पर भी चर्चा जरूरी है।
दलेर मेहंदी को आमंत्रित करना अपने आप में गलत नहीं है। देश के दूसरे हिस्सों के कलाकारों को बुलाना किसी भी मेले का आकर्षण बढ़ा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या बड़े नामों के बीच उत्तराखंड की अपनी प्रतिभाओं को भी बराबर अवसर मिल रहे हैं? स्थानीय कलाकारों को कितने कार्यक्रम दिए गए, उन्हें कितना पारिश्रमिक मिला और कुल बजट में उनके लिए कितनी राशि रखी गई इन सवालों के जवाब सामने आने चाहिए।
कुंजापुरी मेले के घटनाक्रम ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि सार्वजनिक मंच पर अनुशासन और गरिमा बनाए रखने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है। कलाकार, आयोजन समिति और कार्यक्रम प्रबंधनख्नसभी की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए। यदि किसी कार्यक्रम पर सार्वजनिक धन खर्च किया जाता है, तो चयन प्रक्रिया, भुगतान और अनुबंध की शर्तों में पारदर्शिता भी जरूरी है। मीका सिंह के समर्थन के बाद दलेर मेहंदी से जुड़ा विवाद संगीत जगत से आगे निकलकर सार्वजनिक आयोजनों की कार्यप्रणाली पर बहस का विषय बन गया है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि संबंधित पक्ष इस घटनाक्रम पर क्या स्पष्टीकरण देते हैं और आयोजन समिति अपनी जिम्मेदारी को लेकर क्या रुख अपनाती है।
सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है उत्तराखंड के मेलों में बाहरी सितारों की चमक के साथ पहाड़ के अपने लोककलाकारों को उनका हक कब मिलेगा? विवाद चाहे जिस दिशा में जाए, प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को जिंदा रखने वाले कलाकारों को मंच, सम्मान और उचित पारिश्रमिक मिलना भी उतना ही जरूरी है।





