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एसआईआर पर सियासत तेज

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  • पूर्व सीएम की बेटी विधायक अनुपमा ने लगाए गंभीर आरोप
  • स्कैम और साजिश के दावे से गरमाया सूबे का चुनावी माहौल

देहरादून। उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सियासी बहस लगातार तेज होती जा रही है। अब एक पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की बेटी की विधायक अनुपमा रावत ओर से प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाए जाने के बाद राजनीतिक माहौल और गरमा गया है। उन्होंने इसे कथित तौर पर बड़ा स्कैम बताते हुए आरोप लगाया कि मतदाताओं की आपत्तियों के नाम पर एक सुनियोजित प्रक्रिया चल रही है।
उत्तराखंड में एसआईआर की प्रक्रिया पहले ही राजनीतिक दलों के बीच बहस का विषय बनी हुई है। निर्वाचन विभाग की ओर से मतदाता सूची के सत्यापन और आवश्यक दस्तावेज जुटाने की प्रक्रिया को चुनावी सूची को अधिक शुद्ध और अद्यतन बनाने की कवायद बताया जा रहा है। वहीं विपक्षी दलों का आरोप है कि इस प्रक्रिया में आम मतदाता, खासकर बुजुर्गों और ऐसे लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है जिनके पास पुराने दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं।
इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री की बेटी विधायक अनुपमा रावत की टिप्पणी ने राजनीतिक विवाद को नया आयाम दे दिया है। उनका आरोप है कि आपत्ति की प्रक्रिया का इस्तेमाल सामान्य मतदाता सत्यापन से आगे जाकर राजनीतिक उद्देश्य के लिए किया जा सकता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और निर्वाचन प्रक्रिया के संबंध में अंतिम स्थिति निर्वाचन आयोग के आधिकारिक रिकार्ड और जांच से ही स्पष्ट होगी। एसआईआर को लेकर सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि मतदाता सूची में कितने नाम जुड़ेंगे या हटेंगे। बड़ा सवाल यह है कि पूरी प्रक्रिया पर आम मतदाता कितना भरोसा कर पाएगा।
लोकतंत्र में मतदाता सूची महज नामों की सूची नहीं होती। यही वह आधार है जिसके सहारे नागरिक अपने मताधिकार का इस्तेमाल करता है। इसलिए किसी भी मतदाता को यह आशंका नहीं होनी चाहिए कि दस्तावेजों की कमी, प्रशासनिक गलती या किसी आपत्ति के कारण उसका नाम सूची से बाहर हो सकता है।
यही वजह है कि एसआईआर जैसी प्रक्रिया में पारदर्शिता सबसे महत्वपूर्ण है। निर्वाचन आयोग और प्रशासन को यह साफ करना होगा कि किसी मतदाता के खिलाफ आपत्ति किस आधार पर दर्ज की जा रही है, उसे अपनी बात रखने का कितना अवसर मिलेगा और अंतिम निर्णय से पहले उसकी सुनवाई किस स्तर पर होगी। साजिश और स्कैम जैसे आरोप राजनीतिक रूप से बेहद गंभीर हैं। ऐसे आरोप केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहने चाहिए। यदि किसी के पास ठोस तथ्य, दस्तावेज या प्रक्रिया में अनियमितता के प्रमाण हैं तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए और सक्षम निर्वाचन अधिकारियों के सामने रखा जाना चाहिए।
दूसरी ओर निर्वाचन मशीनरी की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं होगा कि प्रक्रिया नियमों के तहत चल रही है। जब समाज में संदेह पैदा हो जाए तो प्रशासन को तथ्यों के साथ उस संदेह का समाधान करना पड़ता है। उत्तराखंड में चुनावी राजनीति पहले ही 2027 विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रही है। ऐसे समय में मतदाता सूची से जुड़ा कोई भी विवाद स्वाभाविक रूप से राजनीतिक रंग लेगा। इसलिए एसआईआर की प्रक्रिया को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर रखकर संचालित करना जरूरी है।
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में समस्या का एक अलग सामाजिक पक्ष भी है। बड़ी संख्या में परिवारों के पुराने रिकार्ड अलग-अलग स्थानों पर हैं। पलायन के कारण लोगों के पते बदले हैं। कई बुजुर्गों के पास पुराने दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में यदि सत्यापन की प्रक्रिया कठोर होती है तो सबसे पहले वही नागरिक प्रभावित हो सकते हैं जो प्रशासनिक प्रक्रियाओं तक आसानी से नहीं पहुंच पाते। इसलिए एसआईआर में दस्तावेज मांगने के साथ-साथ नागरिकों की वास्तविक परिस्थितियों को भी समझना होगा।
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ एसआईआर अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गया है। सत्ता पक्ष इसे मतदाता सूची को शुद्ध करने की कवायद बता सकता है, जबकि विपक्ष इसे मताधिकार और लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर सवाल उठा रहा है। राजनीति अपनी जगह है, लेकिन मतदाता सूची का सवाल उससे कहीं बड़ा है। यदि कोई अपात्र व्यक्ति सूची में है तो उसे हटाया जाना चाहिए। यदि कोई पात्र नागरिक छूट गया है तो उसका नाम जोड़ा जाना चाहिए। लेकिन दोनों काम एक समान पारदर्शिता और निष्पक्षता से होने चाहिए।
पूर्व मुख्यमंत्री की बेटी के आरोपों ने इस बहस को जरूर तेज कर दिया है, लेकिन अब गेंद निर्वाचन तंत्र के पाले में है। आरोपों का जवाब राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि आंकड़ों, प्रक्रिया और पारदर्शिता से देना होगा। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि कौन किस पर आरोप लगा रहा है। सबसे बड़ा सवाल होता है क्या हर पात्र नागरिक का वोट सुरक्षित है? और एसआईआर की पूरी प्रक्रिया का जवाब इसी एक सवाल में छिपा है।

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