September 7, 2026उत्तराखंड में शिक्षा को लेकर उठ रही आवाजों को अलग-अलग घटनाएं मानकर नजरअंदाज करना आसान है। कहीं बच्चे शिक्षक मांग रहे हैं, कहीं विश्वविद्यालय के विद्यार्थी समय पर परीक्षा परिणाम जारी करने की गुहार लगा रहे हैं, कहीं दिव्यांग विद्यार्थी छात्रवृत्ति, ब्रेल शिक्षक और छात्रावास जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए सड़क पर उतरने को मजबूर हैं और कहीं ग्रामीण अधूरे पड़े नवोदय विद्यालय को पूरा कराने के लिए धरने पर बैठे हैं। लेकिन इन सभी घटनाओं को एक साथ रखकर देखें तो तस्वीर कहीं अधिक गंभीर दिखाई देती है। यह सिर्फ शिक्षा संस्थानों की समस्याओं का मामला नहीं है। यह उस व्यवस्था का संकट है, जिसमें विद्यार्थी को अपनी बुनियादी जरूरत के लिए भी आंदोलन करना पड़ रहा है। उत्तराखंड ने शिक्षा को लेकर बड़े सपने देखे हैं। पहाड़ के दूरस्थ गांवों तक शिक्षा पहुंचाने से लेकर आधुनिक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के दावे लगातार होते रहे हैं। स्कूलों को स्मार्ट बनाने, डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने, नई शिक्षा नीति लागू करने और उच्च शिक्षा को बेहतर करने की घोषणाएं भी कम नहीं हुईं। फिर सवाल यह है कि जब घोषणाओं की इतनी भरमार है तो कक्षाओं में शिक्षक क्यों नहीं हैं? परीक्षा देने के बाद विद्यार्थियों को अपने परिणाम के लिए क्यों भटकना पड़ता है? जिन बच्चों को सामान्य विद्यार्थियों से अधिक संस्थागत सहयोग की आवश्यकता है, उन्हें अपनी सुविधाओं के लिए आंदोलन क्यों करना पड़ता है? कहीं न कहीं हमारी शिक्षा नीति और उसके क्रियान्वयन के बीच एक गहरी खाई बन गई है। शिक्षक का अभाव शिक्षा व्यवस्था की सबसे बुनियादी विफलता है। भवन हो सकता है, फर्नीचर हो सकता है, कंप्यूटर और स्मार्ट बोर्ड भी हो सकते हैं, लेकिन शिक्षक के बिना विद्यालय आखिर विद्यालय कैसे बनेगा? पहाड़ में यह समस्या और गंभीर है। दूरस्थ क्षेत्रों के विद्यालयों में शिक्षकों की कमी का सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है। यही स्थिति आगे चलकर सरकारी स्कूलों से अभिभावकों का भरोसा कम करती है और निजी विद्यालयों की ओर पलायन बढ़ाती है। परीक्षा परिणाम में देरी को भी महज प्रशासनिक लापरवाही मानना गलत होगा। विद्यार्थी के लिए परीक्षा परिणाम उसके जीवन की अगली सीढ़ी है। समय पर परिणाम नहीं आया तो प्रवेश छूट सकता है, प्रतियोगी परीक्षा का अवसर प्रभावित हो सकता है और उच्च शिक्षा की पूरी योजना बिगड़ सकती है, जिस व्यवस्था को विद्यार्थी के भविष्य का रास्ता आसान बनाना चाहिए, वही अगर उसके रास्ते में बाधा बन जाए तो उससे बड़ा विडंबनापूर्ण कुछ नहीं हो सकता। दिव्यांग विद्यार्थियों की स्थिति तो व्यवस्था के लिए और बड़ा आईना है। ब्रेल शिक्षक, छात्रावास, छात्रवृत्ति और सहायक सुविधाओं के लिए उन्हें आंदोलन करना पड़े, यह सवाल केवल किसी एक विभाग से नहीं पूछा जाना चाहिए। यह हमारी समावेशी शिक्षा की पूरी अवधारणा पर सवाल है। समानता का अर्थ सभी को एक जैसी सुविधा देना नहीं, बल्कि जरूरत के अनुसार वह सहयोग देना है जिससे हर विद्यार्थी समान अवसर तक पहुंच सके। इसी तरह किसी गांव में वर्षों से अधूरा पड़ा विद्यालय सिर्फ एक अधूरी इमारत नहीं है। वह उस गांव के बच्चों की उम्मीदों की अधूरी कहानी है। पहाड़ में एक विद्यालय का मतलब केवल पढ़ाई नहीं होता। विद्यालय गांव के सामाजिक जीवन का केंद्र होता है। वह पलायन के खिलाफ एक उम्मीद होता है। जब विद्यालय नहीं बनता या शिक्षक नहीं पहुंचते तो उसके साथ धीरे-धीरे गांव का भरोसा भी कमजोर होता है। इसलिए उत्तराखंड को अब शिक्षा के मूल्यांकन का पैमाना बदलना होगा। केवल यह बताने से काम नहीं चलेगा कि कितने विद्यालय बनाए गए, कितने स्मार्ट क्लास स्थापित हुईं या शिक्षा के लिए कितना बजट खर्च हुआ। असली सवाल होना चाहिए। कक्षा में शिक्षक है या नहीं? विद्यार्थी को समय पर किताब मिली या नहीं? परीक्षा परिणाम समय पर आया या नहीं? दिव्यांग विद्यार्थी को जरूरी सुविधा मिली या नहीं? पहाड़ के बच्चे को अपने गांव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है या नहीं? यह भी देखना होगा कि शिक्षा व्यवस्था में शिकायतों का समाधान आंदोलन के बाद ही क्यों होता है। लोकतंत्र में आंदोलन अधिकार है, लेकिन किसी बच्चे को शिक्षक पाने के लिए, किसी विद्यार्थी को अपना परिणाम पाने के लिए या किसी दिव्यांग छात्र को अपनी मूलभूत सुविधा पाने के लिए आंदोलन करना पड़े तो यह व्यवस्था के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। उत्तराखंड की राजनीति में शिक्षा अक्सर भाषणों का विषय बनती है। चुनाव आते हैं तो स्कूल, शिक्षक, विश्वविद्यालय और युवाओं के भविष्य की बातें होती हैं। लेकिन चुनाव बीतने के बाद वही मुद्दे फाइलों में लौट जाते हैं। अब इस रवैये को बदलने का समय है। क्योंकि शिक्षा कोई ऐसी सड़क नहीं है, जिसे अधूरा छोड़कर अगले बजट में पूरा किया जा सके। विद्यार्थी का एक साल लौटकर नहीं आता। आज उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों से उठ रही छात्र और अभिभावकों की आवाजों को सरकार को चेतावनी की तरह लेना चाहिए। यह आवाजें किसी एक दल के खिलाफ नहीं हैं। यह उस व्यवस्था से सवाल कर रही हैं जो शिक्षा को प्राथमिकता तो बताती है, लेकिन उसकी बुनियादी जरूरतों को समय पर पूरा नहीं कर पाती। शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा किसी मंत्री के भाषण में नहीं, कक्षा के भीतर बैठे उस बच्चे के चेहरे पर होती है जो शिक्षक का इंतजार कर रहा है।और अगर उस बच्चे की आवाज सड़क तक पहुंच रही है तो समस्या बच्चे में नहीं, व्यवस्था की खामोशी में है। उत्तराखंड को अब यह तय करना होगा कि वह शिक्षा को केवल योजनाओं, घोषणाओं और आंकड़ों में देखेगा या सचमुच बच्चों के भविष्य के सवाल के रूप में। क्योंकि जिस प्रदेश में विद्यार्थी पढ़ाई के लिए आंदोलन करने लगें, वहां सबसे पहले आंदोलनकारी विद्यार्थियों को नहीं, शिक्षा व्यवस्था को कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए।