- जंतर-मंतर लाठीचार्ज के बाद कई राज्यों में जेन जेड का प्रदर्शन तेज
- पेपर लीक पर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग ने पकड़ लिया है तूल
- उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में भी युवाओं ने विरोध-प्रदर्शन हुआ शुरू
नई दिल्ली/देहरादून। दिल्ली के जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर संसद कूच कर रहे युवाओं पर हुए लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले छोड़ने की गूंज अब राजधानी की सीमाओं से निकलकर पूरे देश में सुनाई देने लगी है। जिस आंदोलन को शुरुआत में दिल्ली तक सीमित माना जा रहा था, वह अब राष्ट्रीय युवा असंतोष का रूप लेता दिखाई दे रहा है। कई राज्यों में छात्रों और युवाओं ने प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं, जबकि उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में भी युवाओं ने विरोध-प्रदर्शन कर पेपर लीक मामलों की निष्पक्ष जांच, दोषियों पर कड़ी कार्रवाई और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग उठानी शुरू कर दी है।
संसद की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पुलिस ने बैरिकेडिंग की, लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े। बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में भी लिया गया। लेकिन इस कार्रवाई के बाद आंदोलन कमजोर पड़ने के बजाय और व्यापक हो गया। अगले ही दिन जंतर-मंतर पर फिर बड़ी संख्या में युवा जुटे। सोशल मीडिया पर आंदोलन के समर्थन में अभियान तेज हो गया और देश के कई विश्वविद्यालयों तथा छात्र संगठनों ने भी प्रदर्शन की घोषणा कर दी। युवाओं का कहना है कि उनका आंदोलन केवल किसी एक परीक्षा या एक भर्ती तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग का आंदोलन है।
दिल्ली की घटना के बाद विभिन्न राज्यों में छात्र संगठनों, युवा मंचों और सामाजिक संगठनों ने प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। कई स्थानों पर मशाल जुलूस निकाले गए, धरने दिए गए और जिलाधिकारियों के माध्यम से ज्ञापन सौंपे गए। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यदि राजधानी में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले युवाओं पर बल प्रयोग किया जाता है, तो यह लोकतांत्रिक अधिकारों पर सवाल खड़े करता है। आंदोलन अब केवल पेपर लीक का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि युवाओं के सम्मान, भविष्य और शासन की जवाबदेही का प्रतीक बनता जा रहा है।
देवभूमि उत्तराखंड भी इस आंदोलन की आंच से अछूता नहीं रहा। देहरादून, हरिद्वार, हल्द्वानी, श्रीनगर और अन्य स्थानों पर छात्र संगठनों और युवाओं ने विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। कई जगहों पर केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी हुई और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग करते हुए ज्ञापन सौंपे गए। उत्तराखंड के युवाओं का कहना है कि राज्य पहले ही भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं और पेपर लीक जैसी घटनाओं का दंश झेल चुका है। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर उठ रहे आंदोलन के प्रति उनका समर्थन स्वाभाविक है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यदि परीक्षा प्रणाली पर भरोसा ही खत्म हो जाए, तो युवाओं के सामने सबसे बड़ा संकट उनके भविष्य का होता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने विपक्ष को भी सरकार को घेरने का बड़ा अवसर दिया है। संसद के भीतर और बाहर विपक्ष लगातार सरकार पर हमलावर है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन किया और सरकार पर युवाओं की आवाज दबाने का आरोप लगाया। विपक्ष का आरोप है कि सरकार आंदोलन को राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रही है, जबकि असली मुद्दा युवाओं का भविष्य और परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता है।
सरकार की ओर से लगातार यह कहा जा रहा है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है और किसी को भी संसद की सुरक्षा व्यवस्था भंग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि केवल प्रशासनिक कार्रवाई से यह आंदोलन थमता नहीं दिख रहा। सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है एक ओर कानून-व्यवस्था बनाए रखना और दूसरी ओर युवाओं के बीच बढ़ते असंतोष को संवाद के माध्यम से कम करना। यदि आंदोलन और राज्यों में फैलता है, तो यह केवल राजनीतिक नहीं, सामाजिक चुनौती भी बन सकता है।
प्रदर्शन कर रहे युवाओं का कहना है कि वर्षों की मेहनत के बाद यदि परीक्षाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो सबसे बड़ा नुकसान उन लाखों अभ्यर्थियों का होता है जिन्होंने ईमानदारी से तैयारी की है। उनका तर्क है कि भर्ती और परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है। यदि लगातार विवाद सामने आते हैं, तो युवाओं का विश्वास व्यवस्था से उठने लगता है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि सरकार और आंदोलनकारी संगठनों के बीच शीघ्र संवाद स्थापित नहीं हुआ, तो यह आंदोलन और व्यापक हो सकता है। विशेष रूप से ऐसे समय में, जब युवाओं के मुद्दे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में हैं। दिल्ली से उठी यह आवाज अब कई राज्यों तक पहुंच चुकी है। उत्तराखंड सहित विभिन्न राज्यों में शुरू हो रहे प्रदर्शन संकेत दे रहे हैं कि यह केवल राजधानी का आंदोलन नहीं रहा। जंतर-मंतर पर चली लाठियों की गूंज अब देशभर के विश्वविद्यालयों, सड़कों और जनसभाओं तक सुनाई दे रही है। सवाल केवल यह नहीं कि प्रदर्शन कब थमेगा, बल्कि यह है कि क्या सरकार युवाओं की नाराजगी को केवल कानून-व्यवस्था का विषय मानेगी या उसे लोकतांत्रिक संवाद का अवसर समझेगी। आने वाले दिनों में इसी सवाल का जवाब इस आंदोलन की दिशा और देश की राजनीति दोनों तय कर सकते हैं




