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युवाओं की बेचैन आवाज

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दिल्ली के जंतर-मंतर पर पर्यावरण कार्यकर्ता और शिक्षाविद सोनम वांगचुक का आमरण अनशन केवल एक और विरोध-प्रदर्शन नहीं है। काकरोच जनता पार्टी के बैनर तले उनका यह धरना देश की प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली पर उठते उस गहरे संकट का प्रतीक बन गया है, जिसने लाखों युवाओं के भरोसे को झकझोर दिया है। परीक्षा में धांधली, पेपर लीक और लगातार बिगड़ती विश्वसनीयता अब केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास के टूटने का सवाल बन चुकी है। वांगचुक की मांग साफ हैकृशिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और परीक्षा प्रणाली में ठोस सुधार। यह मांग केवल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था के खिलाफ है जो बार-बार आश्वासन तो देती है, लेकिन नतीजे के नाम पर युवाओं को निराशा ही देती है। जब मेहनत, अनुशासन और योग्यता की जगह लीक, सिफारिश और अनियमितता हावी होने लगें, तब लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी युवाओं का विश्वास कमजोर पड़ने लगता है। जंतर-मंतर का धरना इस बात का संकेत है कि परीक्षा सुधार का मुद्दा अब केवल छात्रों या अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं रहा। यह उन परिवारों की चिंता बन चुका है, जो वर्षों की तैयारी, आर्थिक दबाव और मानसिक तनाव के बाद भी सिस्टम की खामियों के कारण बार-बार ठगे जाते हैं। प्रतियोगी परीक्षाएं किसी भी समाज में सामाजिक गतिशीलता का सबसे बड़ा माध्यम होती हैं। यदि वही व्यवस्था संदिग्ध हो जाए, तो प्रतिभा का रास्ता अवरुद्ध हो जाता है। सरकारों की जिम्मेदारी केवल यह कह देने भर से पूरी नहीं होती कि जांच होगी या दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी। पेपर लीक और परीक्षा में धांधली की घटनाएं जब बार-बार सामने आती हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सुधार क्यों नहीं हो पा रहा। क्या तकनीकी सुरक्षा पर्याप्त नहीं? क्या निगरानी तंत्र कमजोर है? क्या जवाबदेही तय करने की इच्छाशक्ति नहीं? इन सवालों के जवाब दिए बिना केवल बयानबाजी से भरोसा वापस नहीं आएगा। सोनम वांगचुक का यह आंदोलन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह किसी एक राज्य, एक परीक्षा या एक भर्ती प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक संकट की ओर इशारा करता है, जिसमें शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा तंत्र और प्रशासनिक पारदर्शिता एक साथ सवालों के घेरे में हैं। जब देश के अलग-अलग हिस्सों से पेपर लीक, नकल और अनियमितताओं की खबरें आती हैं, तो यह समस्या अपवाद नहीं, बल्कि पैटर्न बन जाती है। यह भी सच है कि किसी भी आंदोलन की सफलता केवल नारों या प्रतीकों से नहीं, बल्कि उसके पीछे मौजूद नैतिक ताकत से तय होती है। वांगचुक का अनशन इस मायने में प्रभावशाली है कि वह शिक्षा, पर्यावरण और सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी की बात करने वाले एक ऐसे चेहरे से आ रहा है, जिसे गंभीरता से सुना जाता है। लेकिन सरकार के लिए यह परीक्षा केवल राजनीतिक दबाव की नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और सुधार की इच्छाशक्ति की भी है। यदि केंद्र सरकार इस आंदोलन को केवल एक प्रतीकात्मक विरोध मानकर टालने की कोशिश करती है तो यह युवाओं के असंतोष को और गहरा कर सकता है। दूसरी ओर यदि वह इसे एक चेतावनी की तरह लेकर परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, स्वतंत्र निगरानी, कड़ी जवाबदेही और समयबद्ध सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाती है, तो यह संकट अवसर में बदल सकता है। जरूरत इस बात की है कि परीक्षा प्रणाली को केवल तकनीकी सुधारों से नहीं, बल्कि संस्थागत ईमानदारी से मजबूत किया जाए। पेपर सेटिंग से लेकर वितरण, निगरानी, मूल्यांकन और परिणाम तक हर स्तर पर ऐसी व्यवस्था बने, जिसमें गड़बड़ी की गुंजाइश न्यूनतम हो। साथ ही दोषियों पर ऐसी कार्रवाई हो जो उदाहरण बने, ताकि भविष्य में कोई भी इस व्यवस्था से खिलवाड़ करने की हिम्मत न कर सके। अंततः सोनम वांगचुक का जंतर-मंतर पर बैठा अनशन केवल एक व्यक्ति की लड़ाई नहीं है। यह उस पीढ़ी की आवाज है, जो अपनी मेहनत का सम्मान चाहती है। सवाल यह नहीं है कि सरकार इस धरने को कैसे देखती है। असली सवाल यह है कि क्या वह इस पुकार को सुनकर परीक्षा व्यवस्था को सचमुच सुधारने का साहस दिखाएगी? यदि नहीं, तो यह अनशन केवल एक विरोध नहीं, बल्कि आने वाले समय की बड़ी चेतावनी साबित होगा।

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