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संकट में पहाड़ का अस्तित्व

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पहाड़ की जिन वादियाें में आकर आदमी के थके हारे शरीर और मन को सुकून मिलता है जिन पहाड़ की निर्मल जल धाराओं में आस्था की डुबकी लगाकर परम शांति का एहसास होता है उस पहाड़ का जनजीवन इन दिनों आसमान से बरस रही आफत की बरसात से संकट से फंसा हुआ है। पहाड़ दरक रहे हैं और नदियां नालों का उफनता जल प्रवाह अपने साथ सब कुछ बहा कर ले जाने पर आमादा दिख रहा है मलबे में दबी जिंदगियों की खोज का काम भी मुश्किल हो गया है। संकट इतना विकराल हो चुका है कि तमाम मानवीय कोशिशें इस आपदा के सामने विवश और लाचार दिखाई दे रही है। चारों ओर त्राहिमाम त्राहिमाम मचा हुआ है लोगों को अब ऐसा लग रहा है कि सिर्फ कुदरत का नियंता ही उन्हें इस मुसीबत से निजात दिला सकता है। बात चाहे हिमाचल की हो या फिर जम्मू कश्मीर की अथवा उत्तराखंड की हर राज्य की स्थिति कमोवेश एक जैसी ही है। इस आपदा से जान माल का कितना नुकसान हुआ अभी इसका आकलन भी संभव नहीं है। क्योंकि अभी न तो आपदा का कहर थमने का नाम ले रहा है और इसका क्षेत्र विस्तार भी तेजी से बढ़ रहा है बात अगर उत्तराखंड की की जाए तो यहां हालात इतने विकराल हो चुके हैं कि बादल फटने और तबाही की खबरों से लोग डरे सहमें हैं। अभी बीते दिनों धराली में खीर गंगा ने ऐसी तबाही मचाई की सैकड़ो हेक्टर में जहां घर, मकान और दुकान थी 30 से 40 तक मलवे में दब गए। इस आपदा ने लोगों को भाग कर जान बचाने का भी मौका नहीं दिया। कितने मरे और कितने मलबे में दब गए अब तक उन्हें खोज पाना तो दूर उनकी संख्या का भी पता नहीं चल सका है। आपदा प्रबंधन की टीमें और शासन—प्रशासन यहां पहुंच पाता या कुछ कर पाता संभव ही नहीं रहा क्योंकि सड़क टूट चुकी थी और मौसम खराब था अभी धराली का दर्द कम हो पाता उससे पहले ही ऐसी तबाही की खबर थराली से भी आ गई, कई गांव आपदा की चपेट में आ गए जहां अभी भी बचाव और राहत का काम जारी है। बीते एक दिन पूर्व राज्य के तीन जिलों रुद्रप्रयाग, चमोली और बागेश्वर में तीन जगह बादल फटे और चारों ओर हाहाकार मच गया। दर्जन भर से अधिक गांव पहाड़ से आये मलबे और बोल्डरो की चपेट में आ गए जिसमें आठ लोगों के मरने और दर्जन भर से अधिक लोगों के मलबे में दबे होने या लापता होने की बात कही जा रही है। सवाल यह भी है कि शासन—प्रशासन के पास भी सीमित संसाधन है। एनडीआरफ, एसडीआरएफ और आईटीबीपी के साथ पुलिस—प्रशासन पीड़ितों की मदद में भले ही दिन—रात जुटा हो लेकिन वह कहां—कहां मदद पहुंचाये और कैसे मदद पहुंचायें यह एक यक्ष प्रश्न है। अगर 2013 की तरह आपदा का क्षेत्र एक रहा होता तो उस पर पूरा ध्यान दिया जा सकता था लेकिन जब पूरा राज्य ही आपदा ग्रस्त है तो फिर यह चुनौती इतनी बड़ी हो चुकी है कि शासन प्रशासन भी इसके आगे लाचार हो चुका है। अब इस समस्या का समाधान सिर्फ मानसून की विदाई पर ही निर्भर है। राज्य में इस साल रिकॉर्ड बारिश हो चुकी है और इसका क्रम जारी है आज भी मौसम विभाग द्वारा पूरे राज्य में भारी और भारी से भी भारी बारिश का अलर्ट जारी किया गया हैं। राज्य की सभी नदियों का जलस्तर खतरे के निशान छू रहा है। झील और बांधों की हालत यह है कि वह लबालब हो चुके हैं तथा इनसे पानी छोड़ा जाना मजबूरी हो चुका है अब यह पानी मैदानी हिस्सों में भी तबाही मचा रहा है। कुछ लोग इसे दैवीय प्रकोप भी मान रहे हैं भले ही यह दैवीय प्रकोप न सही और जलवायु परिवर्तन का नतीजा ही हो लेकिन यह परिवर्तन मनुष्योंं द्वारा प्रकृति से की जाने वाली अनावश्यक और अत्यधिक छेड़छाड़ तथा प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की अति के कारण ही हो रहा है विकास की अंधी दौड़ ने ही इस तरह के हालात पैदा किए हैं। पहाड़ पर हो रहे अनियोजित विकास को अगर नहीं रोका गया तो पहाड़ के अस्तित्व को कोई नहीं बचा सकेगा अभी भी अगर सरकारों और स्थानीय लोगों की समझ में यह बात नहीं आ रही है तो उसे पहाड़ का मिटता अस्तित्व देखने को तैयार रहना चाहिए।

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