उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में कांवड़ियों के उत्पात की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही है। कहीं होटल ढाबों में तोड़फोड़ तो कहीं वाहनों पर हमले, ऐसा लगता है कि इन उत्पाती कांवड़ियों पर शासन—प्रशासन का कोई भी नियंत्रण नहीं रह गया है। एक बात स्पष्ट है कि इस तरह के उत्पात मचाने वाले लोग शिव भक्त तो कम से कम नहीं हो सकते हैं, जो लोग भक्ति भाव के वशीभूत होकर कावड़ लेने घर से निकलते हैं उनका इस तरह की घटनाओं से कोई सरोकार नहीं हैं। वह अपनी भक्ति में लीन है और बिना किसी विवाद में उलझे अपना काम कर रहे हैं लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस अत्यंत ही भक्ति भाव वाली कावड़ यात्रा में कुछ ऐसे अराजक तत्वों की घुसपैठ भी हो गयी है जो सिर्फ मौज मस्ती और हुड़दंग करने के लिए यात्रा पर हैं। छोटी—छोटी बातों पर उनका बखेड़ा खड़ा कर देना और कानून व्यवस्था को तार तार कर देना इसलिए भी संभव हो पा रहा है क्योंकि सरकारों द्वारा उनके खिलाफ कोई सशक्त कार्यवाही नहीं की जा सकती है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि अब इन उत्पाती कॉवंड़ियों द्वारा पुलिस और प्रशासन से भी भिड़ने मेंं कतई संकोच नहीं किया जा रहा है। भले ही कांवड यात्रा पर तैनात किए गए पुलिस व सुरक्षा बलों के जवान मीडिया के कैमरे के सामने अपनी बात कहने से बच रहे हो लेकिन वह दबी जुबान से अपनी इस पीड़ा को जरूर बयां कर रहे हैं कि जब सरकार के संरक्षण में यह सब कुछ हो रहा है तो वह भला कैसे किसी को रोक सकते हैं। यह सच भी है कि सरकार इन कांवड़ियों पर पुष्प वर्षा कर उनका स्वागत कर रही है तो फिर किसी पुलिसकर्मी की क्या हिम्मत हो सकती है कि उनसे वह कुछ भी कह सके। भले ही शासन—प्रशासन द्वारा इन कांवड़ियों के लिए उनके मार्ग निर्धारण से लेकर तमाम तरह के दिशा निर्देश तैयार किए गए हो, लेकिन वह कहीं भी उनका अनुपालन करते नहीं दिख रहे हैं। इस कावड़ यात्रा को सही मायने में नेताओं ने अपने उस हिंदुत्व के मुद्दे का शक्ति प्रदर्शन बना दिया है जिसे लेकर पूरे देश में हिंदू—मुस्लिम की राजनीति हावी है। जिस तरह का उत्पात इस बार कांवड़ यात्रा में दिख रहा है उस उन्माद को देख कर किसी को भी डर लग सकता है। धार्मिक उत्सवों और यात्राओं का मकसद अगर जातीय तथा धार्मिक उन्माद पैदा करना हो जाए तो उसके परिणाम क्या होंगे इस मुद्दे पर कोई भी सोचने को तैयार नहीं है। बात तो अब इससे भी बहुत आगे निकल चुकी है। कांवड़ यात्रा के इस रंग ढंग से अब हिंदुओं में भी बेचैनी दिख रही है और लोगों ने यूपी तथा उत्तराखंड में यहां तक कहना शुरू कर दिया है कि सत्ता में बैठे लोग भले ही इसे अपने फायदे का सौदा मान रहे हो लेकिन आने वाले समय में उन्हें इसका भारी नुकसान ही होगा। किस दल व नेता को इसका लाभ या नुकसान होगा अलग बात है फिलहाल समाज को इसका नुकसान जरूर हो रहा है और परेशानियां उठानी पड़ रही है।



